उन दिनों बीजेपी मेरी बीट हुआ करती थी, एक प्रोडक्शन हाउस के लिए मैं रिपोर्टिंग करता था। इन्ही दिनों बीजेपी के चाणक्य प्रमोद महाजन को भी कई बार नजदीक से देखने का मौका मिला कई बार पार्टी कार्यालय में या फिर सफदरजंग लेन के उनके बंगले पर। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में प्रमोद महाजन की क्या हैसियत थी किसी से छुपी नहीं...पार्टी के हर फैसलों में उनका दखल होता और सरकार के हर काम उनसे सलाह लिए बिना किए नहीं जाते। बेहद सधा हुआ व्यक्तित्व , दिग्गज राजनेताओं जैसे हावभाव और बोलने में महारत । जमीन से जुड़ा नेता न होने के बावजूद प्रमोद महाजन का पार्टी में कोई सानी नहीं था। हालांकि उस वक्त भी उनकी पर्सनल जिंदगी को लेकर पत्रकार बिरादरी में तरह तरह की चर्चाएं होती रहतीं थीं पर प्रमोद महाजन ऐसी बातों को सौ पर्दों में रखना अच्छी तरह जानते थे। राज़ तो बहुत थे पर उनकी जिंदगी तक वो राज़ ही रहे। ये भी एक संयोग है कि अपने ही भाई के हाथों हत्या के बाद उनकी मौत भी एक ऐसा राज़ बन गई जो कभी दुनिया के सामने नहीं खुल पाएगा।
प्रमोद महाजन की अचानक हत्या और महाजन फैमिली पर टूटा दुखों का पहाड़.....ये वो पल था जब देश ने पहली बार महाजन परिवार के चश्मो चिराग की सूरत देखी, उसे पहचाना। ये वो पल था जब मां रेखा महाजन और बहन पूनम महाजन को राहुल की सबसे ज्यादा जरूरत थी.....पिता की जलती चिता के सामने मां को संभालते, उन्हें दिलासा देते राहुल महाजन को जिसनें भी देखा वो....रो दिया....लोगों को पहली बार पता चला कि प्रमोद महाजन का इतना बड़ा बेटा भी है। साथ ही लगा कि चलो अब पूरे घर की जिम्मेदारी राहुल के कंधों पर होगी। बीजेपी के कुछ नेता तो राहुल महाजन में प्रमोद महाजन का अक्स भी देखने लगे और उन्हें राहुल मे प्रमोद जी का राजनीतिक वारिस नजर आने लगा । पर पिता की अस्थियों को गंगा मय्या की गोद भी नसीब नहीं हुई थी कि राहुल ने अपना असली रूप दुनिया के सामने दिखा दिया। वो ड्रग्स के चंगुल में ऐसा फंसे कि जेल तक जाना पड़ा.....जमानत पर रिहा हुए....तो उन्हें खुद सहारे की जरूरत थी.....मेरे ख्याल से कोई भी भूला नहीं होगा उन तस्वीरों को जिसमें चार पांच पुलिस वाले उन्हें पकड़कर , कंधों से उठाकर कोर्ट से बाहर ला रहे थे।
जिसे प्रमोद जी के जाने के बाद खुद परिवार का सहारा बनना था वो खुद बेसहारा था। और ऐसे मुश्किल वक्त में उनका सहारा बनीं श्वेता सिंह। राहुल का पहला प्यार और उनके बचपन की दोस्त श्वेता। राहुल और श्वेता दोनों ने जेट एयरवेज में पायलट के तौर पर अपना करियर शुरू किया था। दरअसल प्रमोद महाजन की भी ये दिली इच्छा थी कि श्वेता उनके घर की बहू बने । सो राहुल की आदतों के बारे में सब कुछ जानते हुए भी श्वेता ने अपने दिल की आवाज सुनी....और राहुल से शादी कर ली। खुद श्वेता ने एक बार कहा था कि उस वक्त हालात ही कुछ ऐसे हो गए थे जिन्हें मैं इग्नोर नहीं कर पाई वही किया जो दिल ने कहा....
पर अफसोस मुश्किल वक्त में खुद का सहारा बनने वाले अपने इस हमसफर को भी राहुल ने वो दर्द दिए कि रिश्तों का सारी डोर टूट गई...शादी के एक साल 4 महीने ही बीते थे कि एक अखबार में छपी चंद तस्वीरों ने एक बाऱ फिर महाजन परिवार के इस लाडले की पर्सनल जिंदगी को सड़क पर ला दिया। अपने पति के जुल्म के बाद चोटें दिखातीं श्वेता की तस्वीरों को देखने के बाद कुछ कहने सुनने के लिए बचा नहीं......हवा में श्वेता के साथ प्लेन संभालने वाले राहुल अपनी पहली शादीशुदा जिंदगी के ठहराव को संभाल नहीं सके... खबर ये भी आई कि बॉलीवुड की एक अभिनेत्री के साथ राहुल महाजन का रिश्ता इस शादी पर भारी पड़ा। हर तरफ चर्चे होने लगे राहुल की रंगीन मिज़ाजी के , मीडिया की नजर में प्रमोद महाजन का वारिस अब राहुल महाजन से रंगीला राहुल बन चुका था। श्वेता ने तलाक की अर्जी दाखिल की । राहुल भी तलाक लेना चाहते थे..इसलिए कोई परेशानी नहीं आई और दोनों का तलाक हो गया....और इस तरह से राहुल की रंगीली दुनिया और उनके बुरे बर्ताव ने उनका पहला प्यार उनसे छीन लिया....और पुरानी दोस्त श्वेता के साथ उनकी पहली शादी नाकाम हो गई....
इस बीच एक काम और हुआ था इतने दिनों तक गलत कारणों से ही सही मीडिया में छाए रहने के बाद राहुल महाजन एक जाना पहचाना चेहरा बन चुके थे , लोग उन्हें जानने लगे थे सो उन्हें मौका मिला बिग बॉस 2 में एक कंटेस्टेंट के तौर पर, लेकिन यहां भी राहुल ने प्रमोद महाजन की जिंदगी भर की कमाई इज्जत में पलीता लगाने में कोई कसर छोड़ी नहीं। कभी मोनिका से इश्क लड़ाया तो कभी पायल रोहतगी का मसाज करते नजर आए। कभी पूल में तो कभी आधी रात को लड़कियों के कमरे के अंदर। हर किसी को बता दिया कि राहुल किस चिड़िया का नाम है, एक दो कॉमेडी शोज जज करने के बाद टीवी पर चले महीने भर के ड्रामे, माफ कीजिएगा रिऐलिटी शो के बाद कोलकाता की मॉडल डिंपी से शादी भी टीवी पर ही रचा ली । उऩ दिनो राहुल से एक बार मेरी बात हुई तो वो इसी बात पर जोर देते रहे कि इस बार शादी सात जन्मों के लिए कर रहा हूं, सीरियस हूं , अब आप टीवी वालों को कुछ कहने का कोई मौका नहीं दूंगा। पर देखिए पांच महीने भी नहीं गुजरे की एक बार फिर घर की लड़ाई सड़कों पर, एक बार फिर पत्नी डिंपी, श्वेता की तर्ज पर अखबार वालों को उनकी दीं चोटें गिनाती फिर रही हैं और पायल जैसी हसीनाओं से अफेयर के चर्चे मीडिया की सुर्खियां बनी हुई हैं।
वाकई आज हैरत होती है देखकर कि राहुल उसी प्रमोद महाजन के बेटे हैं जिन्होंने हर पल मीडिया के बीच रहकर भी कभी अपनी व्यक्तिगत बातों को पब्लिक नहीं होने दिया । राहुल के ये रंग देखकर मुमकिन है बहुत लोग उनकी परवरिश पर भी सवाल खड़े करते हों । पर राहुल को इन सब बातों से शायद कोई फर्क नहीं पड़ता, अपने पिता की कमाई जिंदगी भऱ की इजज्त , वो शोहरत शायद उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। पिता की कमाई दौलत को खर्च करने के अलावा उनके पास बस एक ही काम है पब्लिसिटी हासिल करना। और राहुल इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं , ये सोचकर कि बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा। प्रमोद महाजन आज जिंदा होते तो रो रहे होते अपने इस सपूत की कारस्तानियों पर.......कम से कम मुझे तो यही लगता है।
Sunday, 1 August 2010
Monday, 26 July 2010
बीजेपी का 'शाह' तिलक
तीन दिनों से फरार अमित शाह जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में अचानक प्रकट हुए तो लगा कि नेता जी पूरी तैयारी के साथ आए होंगे मीडिया के सवालों का जवाब देने। पर अफसोस थोथा चना बाजे घना वाली कहावत याद आ गई शाह के मुंह से निकली अमृत वाणी सुनकर। एक रिपोर्टर ने उनके और एनकाउंटर करने वाले पुलिस वालों के बीच की बातचीत के ब्यौरे पर सवाल दागा कि क्या कहेंगे शाह साहब आप अपनी सफाई में । सवाल पूछने पर मोदी का ये खासमखास नेता बोल पड़ा कि आपकी मुझसे बात हो रही है , अब अगर मै हत्या कर दूं तो आप दोषी हो जाएंगी। शाह ने समझा मैने सही निशाने पर तीर मारा है, अंदर ही अंदर खुशी उबाल मार रही थी कि एक पत्रकार ने सवाल दाग कर उनकी खुशी वापस हलक में अटका दी, सवाल बहुत छोटा था लेकिन तीर की तरह निशाने पर लगा। पत्रकार ने पूछा, मतलब हत्या आपने नहीं उन पुलिस अफसरों ने की । शाह को मानों काटो तो खून नहीं, क्या बोलें क्या न बोलें। चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था मानों किसी ने चोरी पकड़ ली हो। कुछ समझ नहीं आया , बात तो पते की थी कुछ बोला न गया सो कुछ देर सोचने के बाद बेशर्मी भरी मुस्कान चेहरे पर तैर गई। मन में उमड़ रहे झुंझलाहट के तूफान को संभालते हुए नेता जी उस पत्रकार से बोले आप सीबीआई में शामिल हो जाइए । बात खत्म हो गई औऱ शाह की जान में जान आई। जाहिर है कांग्रेस को गरियाने औऱ तोहमत लगाने के अलावा अमित शाह के पास मीडिया को बताने के लिए कुछ भी ऐसा नही था जो उन्हें बेकसूर साबित कर सके।
शाह ने जो किया सो किया, मार्बल लॉबी को परेशान करने वाले एक गैंगस्टर सोहराबुद्दीन का फर्जी एनकाउंटर फिर उसकी बेकसूर बीवी की जहर का इंजेक्शन देकर हत्या और फिर सोहराबुद्दीन के राइट हैंड तुलसी प्रजापति का फर्जी एनकाउंटर । इन तमाम आरोपों की सफाई अब उन्हें अदालत में देनी होगी। पर सवाल ये नहीं है कि जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा चुका हत्या का एक आरोपी मंत्री बचेगा या नपेगा ? सवाल तो ये है कि देश के मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को क्या हो गया है आखिर हत्या अपहरण और जबरन वसूली जैसे संगीन आरोपों से सने एक शख्स की भरी मीडिया के सामने आरती उतारकर उसकी जयजय कार करके वो साबित क्या करना चाहती है। आखिर ये स्वागत और नारेबाजी किसलिए, क्या अमित शाह कोई जंग जिताउ योद्धा बनकर पार्टी दफ्तर आए थे। या फिर उन्होंने कुछ ऐसा काम किया था जिससे गुजरात की अस्मिता में चार चांद लग गए ।
कहीं ऐसा तो नही कि नरेन्द्र मोदी को सिर आंखों पर बैठाने वाली बीजेपी को सोहराबुद्दीन के खून से रंगे हाथों में नया हिंदू ह्रदय सम्राट नजर आ रहा है । शायद ऐसा ही है तभी तो गुजरात में पार्टी के आला नेतृत्व से लेकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने आडवाणी के घर मीटिंग के बाद उस वक्त फरार चल रहे अमित शाह के सिर पर हाथ रख दिया। किसी ने एक बार ये नहीं कहा कि कानूनी प्रक्रिया का पूरा सम्मान करते हुए शाह जांच में मदद करेंगे। उल्टे ये दावा किया गया कि केंद्र की कांग्रेस सरकार सीबीआई जांच के बहाने शाह पर निशाना साधकर गुजरात में बीजेपी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है। लेकिन शायद ये दावा करते हुए बीजेपी ये भूल गई कि सोहराबुद्दीन एनकाउंटर की जांच का जिम्मा केंद्र सरकार ने नहीं बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सौंपा था। क्या बीजेपी का भरोसा देश की न्यायिक व्यवस्था से भी उठ गया है ? अचानक उसके लिए अमित शाह इतने खास कैसे हो गए कि इतने गंभीर और संगीन आरोपों के तले दबे एक नेता को बचाने के लिए पार्टी ने अपनी इज्जत दांव पर लगा दी। या तो बीजेपी के नेताओं को ये लगता है कि फर्जी एनकाउंटर के एक आरोपी का साथ देकर पार्टी देश के लोगों के बीच बेहतर छवि बना पाने में कामयाब होगी या फिर मोदी का कद पार्टी से भी बड़ा हो चुका है। और अब बीजेपी में वही होगा जो मोदी चाहेंगे। देखिए बीजेपी में मोदी मार्का राजनीति का ये दौर कब तक चलता है और पार्टी को इसका कितना खामियाजा भुगतना पड़ता है
शाह ने जो किया सो किया, मार्बल लॉबी को परेशान करने वाले एक गैंगस्टर सोहराबुद्दीन का फर्जी एनकाउंटर फिर उसकी बेकसूर बीवी की जहर का इंजेक्शन देकर हत्या और फिर सोहराबुद्दीन के राइट हैंड तुलसी प्रजापति का फर्जी एनकाउंटर । इन तमाम आरोपों की सफाई अब उन्हें अदालत में देनी होगी। पर सवाल ये नहीं है कि जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा चुका हत्या का एक आरोपी मंत्री बचेगा या नपेगा ? सवाल तो ये है कि देश के मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को क्या हो गया है आखिर हत्या अपहरण और जबरन वसूली जैसे संगीन आरोपों से सने एक शख्स की भरी मीडिया के सामने आरती उतारकर उसकी जयजय कार करके वो साबित क्या करना चाहती है। आखिर ये स्वागत और नारेबाजी किसलिए, क्या अमित शाह कोई जंग जिताउ योद्धा बनकर पार्टी दफ्तर आए थे। या फिर उन्होंने कुछ ऐसा काम किया था जिससे गुजरात की अस्मिता में चार चांद लग गए ।
कहीं ऐसा तो नही कि नरेन्द्र मोदी को सिर आंखों पर बैठाने वाली बीजेपी को सोहराबुद्दीन के खून से रंगे हाथों में नया हिंदू ह्रदय सम्राट नजर आ रहा है । शायद ऐसा ही है तभी तो गुजरात में पार्टी के आला नेतृत्व से लेकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने आडवाणी के घर मीटिंग के बाद उस वक्त फरार चल रहे अमित शाह के सिर पर हाथ रख दिया। किसी ने एक बार ये नहीं कहा कि कानूनी प्रक्रिया का पूरा सम्मान करते हुए शाह जांच में मदद करेंगे। उल्टे ये दावा किया गया कि केंद्र की कांग्रेस सरकार सीबीआई जांच के बहाने शाह पर निशाना साधकर गुजरात में बीजेपी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है। लेकिन शायद ये दावा करते हुए बीजेपी ये भूल गई कि सोहराबुद्दीन एनकाउंटर की जांच का जिम्मा केंद्र सरकार ने नहीं बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सौंपा था। क्या बीजेपी का भरोसा देश की न्यायिक व्यवस्था से भी उठ गया है ? अचानक उसके लिए अमित शाह इतने खास कैसे हो गए कि इतने गंभीर और संगीन आरोपों के तले दबे एक नेता को बचाने के लिए पार्टी ने अपनी इज्जत दांव पर लगा दी। या तो बीजेपी के नेताओं को ये लगता है कि फर्जी एनकाउंटर के एक आरोपी का साथ देकर पार्टी देश के लोगों के बीच बेहतर छवि बना पाने में कामयाब होगी या फिर मोदी का कद पार्टी से भी बड़ा हो चुका है। और अब बीजेपी में वही होगा जो मोदी चाहेंगे। देखिए बीजेपी में मोदी मार्का राजनीति का ये दौर कब तक चलता है और पार्टी को इसका कितना खामियाजा भुगतना पड़ता है
Sunday, 13 June 2010
राजनीति के गड़े मुर्दे
राजनीति में मुर्दे कभी दफन नहीं किए जाते उन्हें जिंदा रखा जाता है ताकि वक्त आने पर वो बोलें....प्रकाश झा की राजनीति में मनोज वाजपेयी का ये डायलॉग आज नरेंद्र मोदी के पटना के ताजा भाषण के बाद अचानक याद आ गया......। पटना में बीजेपी की स्वाभिमान रैली में पूरे कॉन्फिडेंस से कांग्रेस की बखिया उधेड़ते नरेन्द्र मोदी और साल 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी को उनकी ही मांद में घुसकर उन्हें उनकी औकात बतातीं सोनिया गांधी.....राजनीति के गड़े मुर्दे होते क्या हैं ये जानने के लिए इन दोनों बातों का जिक्र एक साथ करना लाज़मी है....क्योंकि आज अरसे बाद मोदी ने एक बार फिर कुछ गड़े मुर्दों को बुलवाया है....सोनिया गांधी को खरी खरी सुनाई है.....मोदी ने कहा कि भोपाल गैस कांड में हजारों लोगों की जानें गईं...और भोपाल के गुनहगार वॉरेन एंडरसन को बचाने में उस वक्त की कांग्रेस शासित केंद्र और राज्य सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी ....अब सोनिया गांधी इस मसले पर चुप क्यों हैं....वो अपना मौन तोड़ें और देश को बताएं कि असली 'मौत का सौदागर' कौन है.....
मोदी एक सधे हुए राजनेता हैं...वो एक एक शब्द तोलकर बोलते हैं....'मौत का सौदागर' - गुजरात दंगों की कालिख ढो रहे मोदी के लिए ये जुमला बेहद खास है....क्योंकि पहली बार इसका इस्तेमाल 2007 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनके खिलाफ अपनी एक चुनाव रैली में किया था ....सोनिया ने मोदी की इस दुखती रग पर ये सोचकर हाथ रखा था कि मोदी को मौत का सौदागर बताने पर अल्पसंख्यकों के जख्म हरे होंगे....एक सूबे की जनता को अपने मुखिया के चेहरे के पीछे छुपा चेहरा नजर आएगा...और वोट लहर उनके पक्ष में जाएगी.....लेकिन हुआ ठीक इसका उलट.....वोटरों के ध्रुवीकरण में माहिर मोदी की राजनीति जीती और कांग्रेस को मिली हार....और एक बार फिर गुजरात दंगों के आरोपी मोदी भारी बहुमत से जीतकर गुजरात की सत्ता पर काबिज होने में सफल हुए....वो दिन और आज का दिन...मौत के सौदागर नाम का ये जुमला...मोदी का चहेता जुमला बन गया...क्योंकि ये उन्हें याद दिलाता है उनकी जीत और सोनिया की हार की। वैसे दाद देनी होगी मोदी के कॉन्फिडेंस की इस जुमले का दुबारा जिक्र करने से वो जरा भी नहीं चूके....ये जानते हुए कि इस जुमले की आंच में देश के लिए सबसे बड़ा शर्म बन चुके गुजरात दंगों के जख्म फिर से हरे हो सकते हैं...मोदी ने दरअसल इस बात की कभी फिक्र की ही नहीं ...क्योंकि राजनैतिक तौर पर दंगों के दंश ने उन्हें फायदा ही फायदा दिया है....दंगे हमेशा उनके लिए मुनाफे का सौदा ही साबित हुए हैं। वो पहले से ज्यादा मजबूत हुए...बीजेपी में उनका कद बढ़ा....संघ में उनकी पूछ बढ़ी....वो बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार तक कहे जाने लगे...और दंगों का दाग लादे सरकार कायम रखकर खुद को उन्होंनें एक मझा हुआ राजनेता साबित किया।
वैसे मोदी के इस बयान को सुनकर चोर चोर मौसेरे भाई वाली कहावत भी याद आ गई.....क्योंकि मोदी कांग्रेस से यही तो कहना चाहते थे कि 2002 में गुजरात में मैने जो किया वो किया, हमारा दामन अगर दागदार है तो आप कौन से दूध के धुले हैं...आखिर भोपाल गैस कांड में 25000 मौतों के जिम्मेदार शख्स यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन को कांग्रेस की तत्कालीन राज्य और केंद्र सरकार ने भगाने में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखाई । मोदी ने इस बार सोनिया की ही तरह कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रखा है, ये मु्द्दा वैसे भी इस वक्त कांग्रेस के गले की सबसे बड़ी हड्डी है...सोनिया गांधी चुप हैं और प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गजों तक को ये समझ में नहीं आ रहा कि पार्टी की खाल कैसे बचाई जाए.....जाहिर है ये दौर 1984 का तो है नहीं कि सरकारें कुछ भी करके निकल जाएं...हमारे देश का मीडिया आज बेहद मजबूत है और सरकारी निकम्मेपन की पोल खोलने को आतुर भी....जनता भी अब पहले से ज्यादा जागरूक है और सरकारें जवाबदेह....लिहाजा कांग्रेस को बैकफुट पर जाने के अलावा कोई चारा नजर नहीं आता।
अब राजनीति में गड़े मुर्दे कितना काम आते हैं ये तो आप समझ गए होंगे..लेकिन मुमकिन है मेरी तरह ये न समझ पाएं हों कि आखिर मोदी के गड़े मुर्दे जब जिंदा होते हैं उन्हें फायदा क्यों पहुंचा जाते हैं और कांग्रेस के गड़े मुर्दे जब कब्र से बाहर आते हैं तो पार्टी को नुकसान क्यों दे जाते हैं....समझ में आ जाए तो बताइएगा जरूर.....
मोदी एक सधे हुए राजनेता हैं...वो एक एक शब्द तोलकर बोलते हैं....'मौत का सौदागर' - गुजरात दंगों की कालिख ढो रहे मोदी के लिए ये जुमला बेहद खास है....क्योंकि पहली बार इसका इस्तेमाल 2007 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनके खिलाफ अपनी एक चुनाव रैली में किया था ....सोनिया ने मोदी की इस दुखती रग पर ये सोचकर हाथ रखा था कि मोदी को मौत का सौदागर बताने पर अल्पसंख्यकों के जख्म हरे होंगे....एक सूबे की जनता को अपने मुखिया के चेहरे के पीछे छुपा चेहरा नजर आएगा...और वोट लहर उनके पक्ष में जाएगी.....लेकिन हुआ ठीक इसका उलट.....वोटरों के ध्रुवीकरण में माहिर मोदी की राजनीति जीती और कांग्रेस को मिली हार....और एक बार फिर गुजरात दंगों के आरोपी मोदी भारी बहुमत से जीतकर गुजरात की सत्ता पर काबिज होने में सफल हुए....वो दिन और आज का दिन...मौत के सौदागर नाम का ये जुमला...मोदी का चहेता जुमला बन गया...क्योंकि ये उन्हें याद दिलाता है उनकी जीत और सोनिया की हार की। वैसे दाद देनी होगी मोदी के कॉन्फिडेंस की इस जुमले का दुबारा जिक्र करने से वो जरा भी नहीं चूके....ये जानते हुए कि इस जुमले की आंच में देश के लिए सबसे बड़ा शर्म बन चुके गुजरात दंगों के जख्म फिर से हरे हो सकते हैं...मोदी ने दरअसल इस बात की कभी फिक्र की ही नहीं ...क्योंकि राजनैतिक तौर पर दंगों के दंश ने उन्हें फायदा ही फायदा दिया है....दंगे हमेशा उनके लिए मुनाफे का सौदा ही साबित हुए हैं। वो पहले से ज्यादा मजबूत हुए...बीजेपी में उनका कद बढ़ा....संघ में उनकी पूछ बढ़ी....वो बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार तक कहे जाने लगे...और दंगों का दाग लादे सरकार कायम रखकर खुद को उन्होंनें एक मझा हुआ राजनेता साबित किया।
वैसे मोदी के इस बयान को सुनकर चोर चोर मौसेरे भाई वाली कहावत भी याद आ गई.....क्योंकि मोदी कांग्रेस से यही तो कहना चाहते थे कि 2002 में गुजरात में मैने जो किया वो किया, हमारा दामन अगर दागदार है तो आप कौन से दूध के धुले हैं...आखिर भोपाल गैस कांड में 25000 मौतों के जिम्मेदार शख्स यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन को कांग्रेस की तत्कालीन राज्य और केंद्र सरकार ने भगाने में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखाई । मोदी ने इस बार सोनिया की ही तरह कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रखा है, ये मु्द्दा वैसे भी इस वक्त कांग्रेस के गले की सबसे बड़ी हड्डी है...सोनिया गांधी चुप हैं और प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गजों तक को ये समझ में नहीं आ रहा कि पार्टी की खाल कैसे बचाई जाए.....जाहिर है ये दौर 1984 का तो है नहीं कि सरकारें कुछ भी करके निकल जाएं...हमारे देश का मीडिया आज बेहद मजबूत है और सरकारी निकम्मेपन की पोल खोलने को आतुर भी....जनता भी अब पहले से ज्यादा जागरूक है और सरकारें जवाबदेह....लिहाजा कांग्रेस को बैकफुट पर जाने के अलावा कोई चारा नजर नहीं आता।
अब राजनीति में गड़े मुर्दे कितना काम आते हैं ये तो आप समझ गए होंगे..लेकिन मुमकिन है मेरी तरह ये न समझ पाएं हों कि आखिर मोदी के गड़े मुर्दे जब जिंदा होते हैं उन्हें फायदा क्यों पहुंचा जाते हैं और कांग्रेस के गड़े मुर्दे जब कब्र से बाहर आते हैं तो पार्टी को नुकसान क्यों दे जाते हैं....समझ में आ जाए तो बताइएगा जरूर.....
Sunday, 6 June 2010
प्रकाश झा की मजबूर'नीति'
राजनीति किस हद तक गंदी हो सकती है, राजनीति कैसे रंग बदल सकती है...और राजनीति कैसे एक भरे पूरे परिवार को नफरत और बदले की आग में अंगार बना सकती है....ये सब कुछ देखने को मिला प्रकाश झा की राजनीति में। हमारे देश की स्टेट पॉलिटिक्स का खाका खींचने की कोशिश में झा बहुत हद तक कामयाब रहे हैं....गंगाजल और अपहरण जैसी फिल्मों के जरिए जबरदस्त फैन फालोइंग बटोरने वाले प्रकाश झा ने इस फिल्म के बाद अपना लोहा मनवाने वालों की फेहरिस्त में और इजाफा कर दिया है। इस वीकएंड फिल्म देखकर निकला तो मन में यही ख्याल आया कि महाभारत के किरदारों की माला में आज के राजनेताओं को पिरोने का ये काम बखूबी अंजाम दिया है डायरेक्टर ने...बड़ा कैनवास, बड़ा बजट और सितारों की लंबी चौड़ी फौज....और नाना से लेकर रणबीर तक सबकी शानदार अदाकारी....मानो एक एक एक्टर इसी रोल के लिए बना हो....सिवाय एक के...
समझ नहीं पाया कि आखिर क्या मजबूरी रही होगी प्रकाश झा जैसे दिग्गज डायरेक्टर के सामने कि वो फिल्म में एक भी लाईन हिंदी में ढंग से न बोल पाने वाली कटरीना कैफ को लेने पर मजबर हुए.....वो कटरीना जो इस मजबूत फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुईं....जिन्होंनें अपनी अल्हड़ अदाकारी से ये जता दिया कि इतनी फिल्में करने और बॉलीवुड की नंबर वन हिरोइन का तमगा हासिल करने के बाद भी उन्हें अदाकारी की कितनी समझ है...कटरीना ने इस फिल्म के जरिए उन्हें फिल्में हिट कराने का सबसे कामयाब फार्मूला मानने वाले फिल्मकारों को ये भी बता दिया है कि सीरियस रोल्स में उन्हें लेने की भूल न ही करें तो अच्छा...दो चार गाने , दो चार डांस और फिल्मों में ग्लैमर का तड़का लगाने के लिए ही उनका इस्तेमाल किया जाए तो अच्छा ..... जैसा वो अबतक करती आईं हैं....क्योंकि राजनीति में कटरीना जब जब नजर आईं उन्होंनें अपने नाकाबिलियत से दर्शकों को इस बात का ही अहसास कराया कि आप ये सोंचने की भूल न करें कि ये रिएलिटी है...हम लोग ड्रामा कर रहे हैं...तीन घंटे का ड्रामा देखिए और खुशी खुशी घर जाइए....
हिंदी में कटरीना के डायलॉग्स की डबिंग खुद उनसे कराने में प्रकाश झा इतना फख्र क्यों महसूस कर रहे थे , फिल्म देखने के बाद कम से कम मैं तो समझ नहीं पाया...क्योंकि मेरे हिसाब से ये उनके कद के डायरेक्टर की सबसे बड़ी भूल थी , अफसोस प्रकाश झा के चुनाव पर नहीं वक्त पर भी होता है..प्रकाश झा भी क्या करें...बॉलीवुड का ये वो दौर है जिसमें उम्दा अभिनेत्रियों का अकाल पड़ा हुआ है, विदेशों से अभिनेत्रियां इम्पोर्ट की जा रही हैं और यहां लाकर उन्हें स्टार बनाया जा रहा है...तभी तो राकेश रोशन जैसे दिग्गज मैक्सिकन ब्यूटी बारबरा मोरी और इम्तियाज अली गिजे़ल मोंटारियो की अदाकारी पर यहां की अदाकाराओं से ज्यादा भरोसा करते हैं..मिस श्रीलंका जैक्कलीन फर्नाडिंस एक साथ कई फिल्मों में नजर आती हैं..... आप इसे बॉलीवुड का ग्लोबलाइजेशन भी कह सकते हैं पर एक नजर अपने बॉलीवुड पर डालेंगे तो तस्वीर बहुत हद तक साफ हो जाएगी....जरा एक नजर दौड़ाइये और सोचिए आज के दौर में कौन है ऐसी अभिनेत्री जिसमें माधुरी दीक्षित की संजीदगी भी नजर आए और श्रीदेवी का चुलबुलापन भी । जो हर तरह के किरदार में ढलने का माद्दा रखती हो, जो वाकई में अपने दम पर फिल्में चलवाने का दमखम रखती हो....कटरीना से लेकर करीना तक.....और दीपिका से लेकर सोनम कपूर नए दौर की नायिकाओं में सबका ध्यान अभिनय की बारीकियां सीखने में कम, अपने बोल्ड लुक से दर्शकों को चौंकाने और साइज जीरो पर ज्यादा है......देखिए कब खत्म होता है नाकाबिल अभिनेत्रियों की मौज का ये दौर.... कब मिलती है हिंदी सिनेमा को दूसरी माधुरी ...और कब तक चलती है प्रकाश झा जैसे फिल्मकारों की मजबूर नीति।
समझ नहीं पाया कि आखिर क्या मजबूरी रही होगी प्रकाश झा जैसे दिग्गज डायरेक्टर के सामने कि वो फिल्म में एक भी लाईन हिंदी में ढंग से न बोल पाने वाली कटरीना कैफ को लेने पर मजबर हुए.....वो कटरीना जो इस मजबूत फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुईं....जिन्होंनें अपनी अल्हड़ अदाकारी से ये जता दिया कि इतनी फिल्में करने और बॉलीवुड की नंबर वन हिरोइन का तमगा हासिल करने के बाद भी उन्हें अदाकारी की कितनी समझ है...कटरीना ने इस फिल्म के जरिए उन्हें फिल्में हिट कराने का सबसे कामयाब फार्मूला मानने वाले फिल्मकारों को ये भी बता दिया है कि सीरियस रोल्स में उन्हें लेने की भूल न ही करें तो अच्छा...दो चार गाने , दो चार डांस और फिल्मों में ग्लैमर का तड़का लगाने के लिए ही उनका इस्तेमाल किया जाए तो अच्छा ..... जैसा वो अबतक करती आईं हैं....क्योंकि राजनीति में कटरीना जब जब नजर आईं उन्होंनें अपने नाकाबिलियत से दर्शकों को इस बात का ही अहसास कराया कि आप ये सोंचने की भूल न करें कि ये रिएलिटी है...हम लोग ड्रामा कर रहे हैं...तीन घंटे का ड्रामा देखिए और खुशी खुशी घर जाइए....
हिंदी में कटरीना के डायलॉग्स की डबिंग खुद उनसे कराने में प्रकाश झा इतना फख्र क्यों महसूस कर रहे थे , फिल्म देखने के बाद कम से कम मैं तो समझ नहीं पाया...क्योंकि मेरे हिसाब से ये उनके कद के डायरेक्टर की सबसे बड़ी भूल थी , अफसोस प्रकाश झा के चुनाव पर नहीं वक्त पर भी होता है..प्रकाश झा भी क्या करें...बॉलीवुड का ये वो दौर है जिसमें उम्दा अभिनेत्रियों का अकाल पड़ा हुआ है, विदेशों से अभिनेत्रियां इम्पोर्ट की जा रही हैं और यहां लाकर उन्हें स्टार बनाया जा रहा है...तभी तो राकेश रोशन जैसे दिग्गज मैक्सिकन ब्यूटी बारबरा मोरी और इम्तियाज अली गिजे़ल मोंटारियो की अदाकारी पर यहां की अदाकाराओं से ज्यादा भरोसा करते हैं..मिस श्रीलंका जैक्कलीन फर्नाडिंस एक साथ कई फिल्मों में नजर आती हैं..... आप इसे बॉलीवुड का ग्लोबलाइजेशन भी कह सकते हैं पर एक नजर अपने बॉलीवुड पर डालेंगे तो तस्वीर बहुत हद तक साफ हो जाएगी....जरा एक नजर दौड़ाइये और सोचिए आज के दौर में कौन है ऐसी अभिनेत्री जिसमें माधुरी दीक्षित की संजीदगी भी नजर आए और श्रीदेवी का चुलबुलापन भी । जो हर तरह के किरदार में ढलने का माद्दा रखती हो, जो वाकई में अपने दम पर फिल्में चलवाने का दमखम रखती हो....कटरीना से लेकर करीना तक.....और दीपिका से लेकर सोनम कपूर नए दौर की नायिकाओं में सबका ध्यान अभिनय की बारीकियां सीखने में कम, अपने बोल्ड लुक से दर्शकों को चौंकाने और साइज जीरो पर ज्यादा है......देखिए कब खत्म होता है नाकाबिल अभिनेत्रियों की मौज का ये दौर.... कब मिलती है हिंदी सिनेमा को दूसरी माधुरी ...और कब तक चलती है प्रकाश झा जैसे फिल्मकारों की मजबूर नीति।
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