Saturday, 16 March 2019

नफ़रत की पार्टी तो कबसे शुरू है - समीर अब्बास

आख़िर उसने इतनी निर्ममता से 50 लोगों की जान क्यों ले ली ? ये वो बड़ा सवाल है जो हमको आपको और दुनिया भर में रहने वाले हमारे जैसे करोड़ों अरबों लोगों को आज परेशान कर रहा है।


न्यूज़ीलैंड में जो कुछ हुआ वो दहलाने वाला तो है ही..बहुत कुछ सोचने और समझने वाला भी है.
28 साल का एक नौजवान ब्रेंटन टैरेंट हाथों में एक अत्याधुनिक राइफ़ल लेकर सिर पर लगे कैमरे से फेसबुक लाइव करते हुए एक के बाद एक लोगों को मौत के घाट उतार देता है. इस खूंख़ार कारनामे को अंजाम देने के लिए वो जिस जगह का चुनाव करता है वो है ख़ुदा का घर एक मस्जिद..जहां भारी तादाद में लोग खु़दा की दी गई नेमतों का शुक्रिया अदा करने के लिए पहुंचते हैं…जिसे हम और आप नमाज़ के नाम से जानते हैं.
आख़िर नमाज़ पढ़ने वाले इन बेक़ूसूर मज़हबी नमाज़ियों से इस शख्स की क्या परेशानी हो सकती है…और अगर कोई परेशानी थी नहीं तो आख़िर उसने इतनी निर्ममता से 50 लोगों की जान क्यों ले ली? ये वो बड़ा सवाल है जो हमको आपको और दुनिया भर में रहने वाले हमारे जैसे करोड़ों अरबों लोगों को आज परेशान कर रहा है. और इस परेशानी भरे सवाल का जवाब एक ही है – नफ़रत, ये नफ़रत ही है जो इंसान को शैतान बना सकती है.


ज़रा ब्रेंटन टैरेंट के इस आतंकवादी हमले के तरीके पर गौर कीजिए, वो एक रात पहले फेसबुक पर पूरी दुनिया के सामने इस बात का ऐलान करता है कि वो आक्रमणकारियों पर हमला करेगा और उसे सोशल मीडिया साइट पर लाइव दिखाएगा. औऱ फिर वो ऐसा कर भी देता है ये कहते हुए कि अभी तो पार्टी शुरू हुई है. यहां दो बातें सामने निकल कर आती हैं कि एक तो नफरत ने उसे इतना अंधा कर दिया कि उसके सोचने समझने की सलाहियत ही खत्म हो गई और उसे न्यूजीलैंड में बसे सारे मुसलमान अचानक आक्रमणकारी नज़र आने लगे और दूसरा ये कि इस नफ़रत ने उसके अंदर का ये डर भी खत्म कर दिया कि इतने बड़े हमले को अंजाम देने के बाद या तो पुलिस की गोली से वो खु़द मारा जाएगा या फिर कानून उसको सजा ए मौत दे देगा.
ये ठीक वैसा ही है जैसे कुरान में लिखे कुफ़्र और जिहाद जैसे अल्फ़ाज़ों की गलत व्याख्या करके कुछ मुसलमानों को मानव बम बनने या किसी जगह ब्लास्ट करने के लिए राज़ी कर लिया जाता है और वो अपनी जान की परवाह किए बग़ैर, इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मन बनने को राज़ी हो जाते हैं, ये सोचे बग़ैर कि इस्लाम सबसे पहले ये सीख देता है कि एक इंसान का कत्ल पूरी इंसानियत के क़त्ल के बराबर है और इस गुनाह की कोई माफ़ी दीन के हिसाब से भी मुमकिन नहीं है. कहने का मतलब ये कि इस तरह के आतंकी हमले को अंजाम देने वाला भले ही किसी भी मज़हब से ताल्लुक रखता हो आप उसके भटके हुए शैतानी दिमाग़ की पड़ताल करेंगे तो आपको सिर्फ एक ही भावना नज़र आएगी – नफ़रत.
ब्रिटिश अख़बार द सन के मुताबिक हमलावर ख़ुद को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को गोरों की नई पहचान बताते हुए उनका फैन बताता है, बताने की जरूरत नहीं कि ऐसा अमेरिका में मुसलमानों को लेकर दिए गए ट्रंप के सख्त बयानों की वजह से हुआ होगा. इस ऑस्ट्रेलियाई आतंकी टैरेंट को भी व्हाइट सुप्रीमेसी की सनक है वो अपने फेसबुक पर जारी किए चार्टर में आतंकी हमलों में यूरोपीय नागरिकों की जान का बदला लेने की बात कहता है और वहां रह रहे अप्रवासियों को बाहर निकालकर गोरों का राज स्थापित करने की बात करता है वो कहता है कि “अटैक करने वालों को दिखाना है कि हमारी भूमि कभी उनकी नहीं हो सकती. जब तक एक भी गोरा व्यक्ति रहेगा, वो कभी जीत नहीं पाएंगे.”
अपनी पोस्ट में वो ये कहते हुए ख़ुद को जस्टीफ़ाई करने की कोशिश भी करता है कि उसके किसी दोस्त को किस तरह एक मुस्लिम आतंकी ने हमले में मार डाला पर वो ये समझ ही नहीं पा रहा कि इसकी आड़ में अब वो भी इंसानियत का उसी तरह कत्ल करने जा रहा है जो उस मुस्लिम आतंकी ने किया होगा..और वो भी उसी तरह मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे उन तमाम नमाजियों और उनके परिवार वालों को वही दर्द देने जा रहा है जो आंतकी हमले में मारे गए उसके दोस्त और उसके परिवारवालों ने सहा होगा.
भारत में क्या है ख़तरा?
न्यूज़ीलैंड की ये घटना ये साबित करने के लिए भी काफ़ी है कि दहशतगर्दी का कोई मज़हब नहीं होता और आतंकी सिर्फ आतंकी होता है. क्योंकि अब तक आप ये तो समझ ही गए होंगे कि किसी भी आतंकी हमले में किस धर्म का नागरिक शामिल था या किस धर्म के मानने वाले ने किस धर्म के मानने वालों पर अटैक किया ये मायने नहीं रखता मायने बस ये रखता है कि किसके ज़ेहन में किसके लिए कितनी नफ़रत भरी गई और किसे किस धर्म के लोगों के खिलाफ़ कितना भड़काया गया. हम सब ये उम्मीद करते हैं कि हमारे मुल्क में इस तरह की नफरत को कभी जगह न मिली है न मिलेगी और यही वजह है कि हिंदुस्तानी सरज़मीं इस तरह की नफ़रत भरी सोच वाले दहशतगर्दों के लिए कभी उपजाऊ नहीं रही न रहेगी. पर ये कहना भी गलत नहीं होगा कि नफ़रत की पार्टी तो यहां भी कबसे शुरू है…जिस तरह का ज़हर ध्रुवीकरण की चाहत में अपनी सियासत चमकाने की खा़तिर कुछ सियासतदां फैलाते हैं उसके चलते ये ख़तरा जरूर बना हुआ है कि किसके ज़ेहन में किसके लिए कितनी नफरत भर दी जाए.
मेरा ये मानना है कि चाहे एक्सट्रीम लेफ़्ट विचार हों या एक्सट्रीम राइट..अतिवाद कैसा भी हो उसकी बुनियाद यही नफ़रत ही होती है औऱ इसलिए ये किसी भी लिहाज़ से हमारे समाज के लिए बेहतर नहीं है. हद तो ये है कि इस ताज़ा हमले के बाद भी कुछ नेताओं ने ये सवाल उठा दिए कि क्यूंकि हमलावर क्रिश्चियन है इसलिए उदार लोग आज के अटैक की तो चर्चा कर रहे हैं पर इससे पहले इस्लाम के नाम पर हुए हज़ारों आतंकवादी हमलों में ऐसा नहीं किया गया. मेरे हिसाब से इससे बड़ा अपराध और कोई नहीं हो सकता, हर हमले के बाद आतंकी का मज़हब ढूंढने और उसके मज़हब से जुड़े लोगों को टारगेट करने की सोच रखने वाले जान लें कि ऐसा करके वो जाने अनजाने उसी नफ़रत को बढ़ावा दे रहे हैं जो इंसानियत को तार तार करने की सबसे बड़ी जि़म्मेदार है.
ब्रेंटन टैरेंट के शैतानी दिमाग़ में मुसलमानों के प्रति भरी नफ़रत ही थी जिससे न्यूज़ीलैंड की दो मस्जिदों के नमाज़ी अपनी जान नहीं बचा पाए लेकिन उन तमाम दिलों में भरी नफ़रत को ख़त्म करके उस इंसानियत को जरूर जिंदा रखा जा सकता है जिसके तलबगार और हक़दार हम और आप सभी हैं. इसलिए अगर हमें अपने मुल्क से प्यार है तो हमें बस इस देश में एक दूसरे के खिलाफ़ पनप रही इसी नफ़रत पर वार करना है इससे पहले कि ये हम पर वार कर हमें खत्म कर दे. और याद रखिएगा ये वार इंसानियत….अमन और मुहब्बत के…रास्ते पर चलते हुए ही मुमकिन है..आमीन…!

समीर अब्बास, एक्जीक्यूटिव एडिटर, टीवी 9 भारतवर्ष 

Thursday, 9 August 2018

कांवड़ियों के भेस में हुड़दंगी धर्म की कैसी तस्वीर पेश कर रहे हैं?

पहले दिल्ली में राह चलते एक गाड़ी छू भर जाने से कांवड़िए इतने नाराज हुए कि गाड़ी को लाठी डंडों से तोड़ने के बाद उसके एक एक पुर्जें अलग कर दिए....किसी भी सिविलाइज्ड सोसायटी के लोगों के लिए ये तस्वीरें खऔफ पैदा करने वाली थीं कि अगर रास्ते पर निकले और कांवड़ियों से गाड़ी की हल्की सी भी टक्कर हो गई तो अंजाम क्या हो सकता है..फिर यूपी के मेरठ में हेलीकॉप्टर पर बैठकर पुलिस के आला अफसरों का कांवड़ियों के रास्तों पर फूल बरसाना और बाद में मेरठ से ही सटे बुलंदशहर में कांवड़ियों का पुलिस की डायल 100 वैन पर ही ऐसा हमला कि पुलिस तक को भागना पड़ जाय...एक के बाद इन घटनाओं ने हमारे लिए कुछ अहम सवाल उठा दिए हैं...जिनके जवाब आज हम ढूंढने की कोशिश करेंगे....बेशक कुछ कांवड़ियों की गुंडागर्दी की वजह से सभी की भक्ति को कठघरे में खड़ा करना बड़ी नाइंसाफीं होगी और ऐसा कोई कर भी नहीं रहा। पर सवाल ये है कि इस मुल्क से मुहब्बत है तो किसी भी तरह की हिंसा का विरोध हमें बेधड़क करना होगा...आखिर हुड़दंगियों की हिंसा को ढँकने के लिए क्यूँ मिले धर्म की चादर ? और कांवड़ियों के भेस में हुड़दंगी धर्म की कैसी तस्वीर पेश कर रहे हैं? बेशक कुछ कांवड़ियों की गुंडागर्दी की वजह से सभी की भक्ति को कठघरे में खड़ा करना बड़ा अन्याय होगा। न जाने कितने आस्थावान शिव भक्त ऐसे हैं जो बिना किसी को परेशान किए अपनी भक्ति में लीन रहते हैं। पर ये संदेश भी ज़रूरी है कि अराजकता फैलाने वालों को धर्म की चादर ओढ़ने को नहीं मिलेगी । इस मुल्क से मुहब्बत है तो किसी भी तरह की हिंसा का विरोध बेधड़क करना होगा जो हममें से ज़्यादातर आज कर भी रहे हैं। जो हिंसा कर रहा है वो धार्मिक तो हो ही नहीं सकता, जो हिंसक हो गया वो तो पहले ही अपने धर्म से दग़ाबाज़ी कर चुका है, उसे किसी धर्म से जोड़ कर देखना ही नाइंसाफ़ी होगी । 
कोई भी सच्चा इंसान...हिंसक घटनाओं को देख कर ऐसे ही व्यथित होगा...अगर आप नहीं हो रहे...या फिर आज ऐसा लिखने वालों को ट्रोल कर ये याद दिला रहे हैं कि आप तब क्यूँ नहीं बोले...अब क्यूँ बोले तो समझ लीजिए कि इंसानियत मर रही है अंदर ही अंदर...और “धार्मिक उन्माद” हावी हो रहा है।  

Friday, 6 December 2013

क्या इतने भर से ही वो महान नहीं हो जाता ???

एक ऐसा नेता जो दिखता बिल्कुकुल आम आदमी है प्रबुद्ध वर्ग से आता है, IIT से पास आउट है, IRS अफसर रह चुका है ,जिसने पूरी बहादुरी के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर हुक्मरानों को दहला दिया, लोगों में उम्मीद जगाई। हजारों करोड़ पानी में बहाने वाली पार्टियों को बतला दिया कि व्हाइट मनी से चुनाव कैसे लड़ा जाता है , सालों से पैर जमाए बैठी बड़ी बड़ी पार्टियों को जतला दिया कि संगठन कैसे खड़ा किया जाता है। वो हारे या जीते, क्या इतनी कामयाबी ही किसी शख्स को महान नहीं बना देती ? क्या बस इतनी कामयाबी के बाद ही हिंदुस्तान की राजनीति का इतिहास बिना उसका नाम लिए लिखा जा सकेगा ?

Sunday, 17 March 2013

IBN7 के समीर अब्बास को मिला 'बेस्ट न्यूज एंकर' अवॉर्ड


नई दिल्ली। दिल्ली के फिक्की ऑडिटोरियम में आईबीएन7 के प्राइम टाइम एंकर समीर अब्बास को साल 2013 के सर्वश्रेष्ठ न्यूज एंकर के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। ये सम्मान मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया की तरफ से दिया गया।
फेडरेशन हर साल प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सबसे बेहतर काम करने वाले पत्रकारों को मीडिया एक्सीलेंस अवॉर्ड से सम्मानित करता है। आईबीएन7 के असोसिएट एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर समीर अब्बास पिछले 8 सालों से चैनल के लिए काम कर रहे हैं। वो लाइव न्यूज बुलेटिनों के साथ-साथ कई स्पेशल प्रोग्राम की एंकरिंग कर चुके हैं और आपने आक्रामक और तेज तर्रार अंदाज के लिए जाने जाते हैं।

Thursday, 14 March 2013

16 में सेक्स पर हंगामा क्यों ?


सहमति से सेक्स की उम्र 18 से घटाकर 16 करने पर कैबिनेट ने रजामंदी क्या दी बवाल मच गया । वैसे भी पिछले कुछ दिनों से हर गली नुक्कड़ और सरकारी दफ्तरों से लेकर चैनलों के न्यूजरूम तक यही चर्चा का सबसे बड़ा विषय है। ज्यादातर लोग नाक भौं सिकोड़कर भारतीय संस्कृति का रोना रो रहे हैं कि अब तो इस देश को सामाजिक बर्बादी से कोई बचा नहीं सकता । लोगों का तर्क ये भी है कि अगर 16 की उम्र में युवाओं को सेक्स करने की कानूनी इजाजत मिल जाएगी तो संदेश ये जाएगा कि इस देश में शादी से पहले सेक्स की खुली छूट है। या फिर शादी के लिए लड़की की उम्र 18 और लड़के की उम्र 21 के सारे तानेबाने का फिर क्या मतलब। हद तो तब हो जाती है जब कमोबेश सारे न्यूज चैनल भी चर्चा इस बात की शुरू कर देते हैं कि 16 की उम्र में क्या सही है सेक्स, अरे जनाब ये तो मुद्दा ही नहीं है।  

दिलो दिमाग में ऐसे तर्क गढ़ते हुए शायद हम ये भूल जाते हैं कि नैतिकता और सांस्कृतिक विरासत का लबादा ओढ़े हमारे इस समाज में हमारी आपकी नजरों से बच बचाकर क्या हो रहा है। आज की तारीख में जब सहमति से सेक्स की उम्र सीमा 18 साल तय है तब भी 15-16 साल के लड़के लड़कियां सहमति से सेक्स संबंध बना रहे हैं, और अगर आपको ये लगता है कि ऐसा सिर्फ दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में ही हो रहा है तो यकीन मानिए आप सरासर गलत हैं। हां अभी का मौजूदा सिस्टम हमें वो समाज जरूर दे रहा है जिसमें लड़के जवानी की दहलीज पर आने से पहले ही बलात्कारी होने के के ठप्पे और शर्म के साथ जिंदगी बिताने को मजबूर हो जाते हैं। वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने किसी से प्यार किया और एक खास पल में अपने जज्बातों पर काबू नहीं रख सके और गर्लफ्रेंड के साथ उसकी मर्जी से शारीरिक संबंध बना लिया । भले ही आप कम उम्र के इस प्यार को नादान कह कर उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाएं लेकिन क्या हममें से कोई भी ये गवारा कर सकता है कि सिर्फ इस नादानी के लिए किसी लड़के पर हमेशा हमेशा के लिए बलात्कारी होने का ठप्पा लग जाए पर अफसोस अबतक ये हो रहा है। आखिर ये क्या अजब कानून है जो 16 साल की लड़की के पुलिस थाने में आकर रजामंदी से लड़के के साथ सेक्स करने की बात कबूल करने के बावजूद उसके साथी लड़के के खिलाफ बलात्कार का केस दर्ज करने की इजाजत देता है। 

अगर आप समझ रहे हैं कि इस तरह के केसेज इक्का दुक्के ही सुनने में मिलते हैं तो भी अपने विचार बदल लें। पुलिस का कोई भी आला अधिकारी आपको बता देगा कि हर साल इसी तरह कैसे सैकड़ों नौजवानों की जिंदगी शुरू होने से पहले ही उजड़ जाती है। जाहिर है टीन एज में हुए प्यार या कह लीजिए शारीरिक आकर्षण को रोक पाना मां बाप के लिए आसान नहीं होता ये हम सब जानते हैं , आज क्या किसी भी जमाने में ये आसान नहीं रहा । लिहाजा अगर आज की तारीख में जब बच्चे वक्त से कहीं पहले जवान हो रहे हैं  जब दुनिया भर में सहमति से सेक्स की उम्र सीमा औसतन 16 साल है तो भारत में ऐसा होने पर हमें हाय तौबा मचाने के बजाय , सरकार के इस फैसले का भरपूर स्वागत करना चाहिए।  हां इतना जरूर है कि एंटी रेप बिल में किसी लड़की को घूरना , उसका पीछा करना जैसे अपराधों को गैरजमानती धाराओं में डालने का प्रावधान कर सरकार ने इस कानून के दुरूपयोग की प्रबल संभावना पैदा कर दी है जिससे निपटना आने वाले वक्त में पुलिस प्रशासन के लिए गंभीर समस्या जरूर पैदा कर सकता है । पर शायद महिलाओं के लिए बेहद असुरक्षित होते इस समाज में उन्हें हिफाजत का अहसास कराने के लिए मर्दों को इतनी कुर्बानी देनी ही पड़ेगी ।  

Monday, 14 January 2013

जंग की राजनीति

दो मुंडी के बदले दस मुंडी, उन्होंने दो किए हम दस सिर कलम करेंगे। ये किसी तालिबानी नेता का नहीं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुख्य विपक्षी दल के नेताओं का ऐसा बड़बोलापन है जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। ऐसा लग रहा है जैसे बड़े नेता नहीं कक्षा 6 या 7 में पढ़ने वाला कोई झगड़ालू लड़का देश की बड़ी समस्या पर अपनी राय देश के सामने रख रहा हो। समझ में ये नहीं आता कि हमारे नेता ऐसे मुश्किल और संवेदनशील दौर में ऐसे असंवेदनशील और गैरजिम्मेदार बयान भला कैसे दे सकते हैं

हैरत उस वक्त और भी ज्यादा होती है जब देश के कुछ नंबर वन कहे जाने वाले अंग्रेजी दां चैनलों के बेहद सभ्य माने जाने वाले अंग्रेजी पत्रकार अपने प्रोफेशन की मर्यादा लांघते हुए ऐसी उत्तेजना में एंकरिंग नहीं बल्कि भाषणबाजी करने लगते हैं जैसे कल ही दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ने वाला हो और हालात इतने बदतर हो गए हों कि अब बस एक दूसरे को मरने मारने के अलावा , कोई रास्ता न बचा हो।

जाहिर है हमारे जांबाज सैनिकों के शवों पर अपनी नामर्दी के सबूत छोड़कर पाकिस्तान ने एक बेहद क्रूर , बर्बर और नाकाबिले बर्दाशत कदम उठाया है , एक बड़ी हिमाकत की है लेकिन आज इस हिमाकत का इमोशनली नहीं डिप्लोमैटिकली जवाब देने का वक्त है। भावनाओं के ज्वार को ठंडा रखते हुए,  दोनों ओर के बेकसूर जवानों की कीमती जानों को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिए जाने की जरूरत है जिसमें हमारे जनरल बहुत हद तक कामयाब रहे हैं।

उम्मीद की जानी चाहिए की पड़ोसी मुल्क के खिलाफ देश के लोगों में नफरत भरने या शहीद के घरवालों से मिलकर दूसरे दलों के नेताओं पर कीचड़ उछालने की राजनीति बंद होगी और देश के नेता दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाएंगे और सरकार भी विपक्ष को भरोसे में लेकर सख्त ही नहीं एक ठोस मैसेद देगी।  




Monday, 31 December 2012

देश की बेटी के पिता का दर्द




मेरी बेटी, मेरी आंखों का नूर थी

वो मीठे गाने गाने वाली एक चिड़िया थी

मेरी बेटी के रहने से घर में उजाला था, खुशी थी, जीने की इच्छा थी -

लेकिन मेरी बेटी के अंधेरे में गुम होते ही जिंदगी रूठ गई

चाह कर भी मेरी बेटी तुम नजर न आओगी, तुम्हारी खनखनाती आवाज सुनाई नहीं पड़ेगी

लेकिन तुम्हारे बचपन की किलकारी मुझसे कोई छीन नहीं पाएगा

तुम्हारी निर्दोष मुस्कुराहट मेरी आंखों में सदा जिंदा रहेगी

लेकिन बिटिया माफ करना, अब तक घर में तुम्हारी तस्वीर लगा नहीं सका, तुम्हारे अक्स पर फूलों की माला बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा

तुम नहीं हो, फिर भी हर जगह हो, तुम्हारे कपड़े, किताबें सब जस के तस रखे हैं, जैसे हममे से कोई तुम्हें छेड़ना नहीं चाहता

मेरी बेटी, मेरी आंखों का नूर थी

तुम्हाई पढ़ाई ही तो मेरी पूंजी थी

नौकरी की कमाई कम थी, लेकिन मेरी बिटिया की आंखों के सपने बड़े थे, मैंने पुरखों की जमीन बेची, एक कमरे के मकान में तुम्हें पाला, छोटे शहर से आए हम सबों के दिल जो बड़े थे - किताबों से तुम्हारी आंखें चमक उठतीं और उस चमक से मुझे प्यार था, तुम क्लास की टॉपर बनी और मेरे अरमानों को पंख लग गए


लेकिन मेरी बिटिया ये अचानक क्या हो गया -

दौड़ती भागती मेरे चिड़िया अचानक किस जाल में फंस गई - तुम्हारे नर्म मन को कैसे रौंद डाला गया -

जिस बच्ची को गोद में खिलाया उसी को वहशी बलात्कारियों का शिकार बनने के बाद देखते हुए गला रुंध आता - लेकिन तुम्हारे सामने तो रो भी नहीं सकता था -


मेरी बेटी - मेरी आंखों में अंगार भर जाते हैं जब-जब मैं तुम्हें देखता - अस्पताल के बिस्तर पर मशीनों के बीच उदास मुस्कुराहट के बीच  - वो एक पल कैसे भूलूंगा - तुम्हारी आवाज अंतिम बार जब सुनी थी, तुम्हारा अंतिम आंसू जब तुम्हारे गालों पर ढलकते हुए देख पाया था - और तुमने हल्की आवाज में कहा था -

आप सो जाओ - मैं भी अब सोऊंगी, ये कहकर तुमने मेरा हाथ को जैसे गले लगा लिया और तुम्हारी आंखें मुंद गईँ - और एक आंसू चांदी की लकीर सा तुम्हारी आंखों से ढलक कर नीचे गिर गया -

उसके बाद तुम कभी नहीं जगी - अपने संघर्ष में अकेली लड़ी -
जिस बच्ची की डोली उठाता - उसकी चिता को अग्नि दे चुका हूं - मैं कठोर हो चुका हूं मेरी बेटी - मैं बदल चुका हूं बेटी -

लेकिन मैं एक वादा करता हूं - ये आग मैं जला कर रखूंगा, तूफान आए, बारिश हो या जलजला -

ये आग मेरे भीतर ही नहीं देश के कोने कोने तक जलेगी,
तुम्हारी अस्थियां अब इस धरती में मिल चुकी हैं लेकिन
तुम मिट्टी में बदलाव का फूल बनकर जैसे दोबारा जन्म लोगी

वही नूर दोबारा इस दुनिया पर बरसेगा
नूर - बदलाव का - औरतों के प्रति सम्मान का -
इस देश में जननी का सम्मान होगा
एक दिन जरूर
तुम लौटोगी मेरी बेटी, तुम लौटोगी...

(दिल्ली गैंगरेप पीड़ित के पिता के दर्द को समेटती IBN7 के सीनीयर ईपी अनुराग सिंह की कलम से निकलीं कुछ शानदार लाइनें जो किसी का भी कलेजा कंपा दें)


Tuesday, 27 September 2011

भटक गया 'मौसम'

काफी दिनों बाद वीकएंड पर कोई फिल्म देखने का वक्त निकाल पाया। च्वाइस मौसम थी क्योंकि पंकज कपूर को बतौर एक्टर मैं काफी पसंद करता हूं सो सोचा कि, बतौर डायरेक्टर जनाब की पहली फिल्म तो देखनी बनती है । वैसे भी सिनेमा हॉल्स में इसके अलावा कोई दूसरी च्वाइस भी नहीं थी।

फिल्म शुरू होती है पंजाब के एक छोटे से खूबसूरत गांव में एक मुस्लिम लड़की और हिंदू लड़के के बीच पनप रहे प्यार से । ये प्यार, प्यार जितना ही प्यारा है , खूबसूरत है, निस्वार्थ है, बड़ी तसल्ली हुई पर्दे पर ये देखकर कि आज भी कुछ फिल्मकार ऐसे हैं जिनके जेहन में लव , लव ही है लस्ट नहीं बना है । वर्ना आजकल की कुछेक फिल्मों ने तो लव के मायने ही बदल दिए हैं । बहरहाल ये कहना गलत नहीं होगा कि पिता के डायरेक्शन में शाहिद कपूर ने अपने कैरेक्टर के साथ बखूबी न्याय किया है। गांव के गबरू जवान बने शाहिद हर सीन में अपनी काबिलियत साबित करते हैं। हालांकि सोनम की एक्टिंग में सुधार की जरूरत जरूर है । फिर भी एक मुस्लिम लड़की के रोल में वो अच्छी लगी हैं।

लेकिन इंटरवल से पहले पहले ये खूबसूरत मौसम भटकने लगता है। ऐसा लगा जैसे पंकज कपूर ये मान कर बैठ गए कि इसके बाद दोबारा उन्हें फिल्म बनाने का मौका ही नहीं मिलेगा। ऑपरेशन ब्लू स्टार से लेकर गुजरात तक एक खूबसूरत स्वीट लव स्टोरी को उन्होंने दंगों की आग में ऐसा झोंका कि उसने दम तोड़ दिया औऱ मौसम संभल ही नहीं पाया। डायरेक्टर ने हर दंगे , और उससे जुड़े हर मुद्दे पर अपनी राय देने की कोशिश की । 1992 से अगर कहानी को टर्न लेना ही था तो जरूरी नहीं है कि बाबरी विध्वंस दिखाया ही जाए, औऱ अगर 2002 में दो बिछड़े प्रेमियों को मिलना ही था तो जरूरी नहीं कि गुजरात दंगे दिखाए ही जाएं वो भी तब जब दंगों की वजह से कैरेक्टर्स की जिंदगी पर कोई असर न पड़ रहा हो।

सो अफसोस ये 'मौसम' बीच रास्ते में ही भटक गया और पंकज कपूर जैसा काबिल कलाकार एक बेहतरीन फिल्म बनाने से चूक गया ।

Sunday, 17 October 2010

कलमाडी के पीछे कौन ?

कॉमनवेल्थ खेल तो खैर खूबी से खत्म हो गए, अच्छे खासे मेडल्स भी भारत की झोली में आ गए। दुनिया की नजरों में भारत खेलों का नया सुपर पावर बनकर उभरा और मेलबर्न से दिल्ली पहुंचते पहुंचते हमने अपने खेलों का स्तर इतना सुधार लिया किया कि हम चौथे से दूसरे पायदान पर सीना तान कर खड़े हो गए। एक अच्छी बात और हुई कि कम से कम कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान कोई ऐसा हादसा नहीं हुआ जिससे देश की इज्जत पर बट्टा लगता और महाखेलों में महाभ्रष्टाचार की पोल खुल जाती। इंद्र देवता मेहरबान रहे और सालों की जगह महीनों में निपटने वाले काम की असलियत खोल के अंदर ही रह गई।

लेकिन क्या यहीं सारा खेल खत्म हो जाता है, नहीं मेरे हिसाब से असली खेल या कह लीजिए खेल के पीछे का खेल तो अब शुरू हुआ है। आयोजन समिति के अध्यक्ष की हैसियत से कलमाडी ने जो गुल खिलाएं हैं क्या वो उनका पीछे छोड़ देंगे। क्या खैर खूबी से खेल का आयोजन करा लेने भर से उनके सारे पाप धुल जाएंगे, क्या देश की जनता उन्हें माफ कर देगी। इन सारे सवालों का जवाब है शायद नहीं। लेकिन एक औऱ अहम सवाल का जवाब है शायद नहीं औऱ वो सवाल है कि क्या सिर्फ अपने बलबूते कलमाडी ने वो तमाम गुल खिला दिए जिससे उनकी तो क्या उनकी सात पुश्तों को भी एक धेला कमाने की जरूरत न पड़े । जी हां शायद नहीं ।

भला ऐसा कैसै हो सकता है कि देश की नाक के नीचे एक कांग्रेस सांसद और आईओसी अध्यक्ष जिसके ऊपर कॉमनवेल्थ कराने की अहम जिम्मेदारी सौंपी जाती है , वो इस आड़ में केंद्र और दिल्ली की कांग्रेस की सरकार के होते वो कर डालता है जिससे देश की जनता खुद को छला महसूस करने लगती है औऱ देश की साख दांव पर लग जाती है। कैसे 5 करोड़ का काम 50 करोड़ में कराया गया और देश की शान के नाम पर हजारों करोड़ के वारे न्यारे कर दिए गए। नहीं , मै नही मानता कि एक अकेला आदमी महाखेलों में ऐसे महाभ्रष्टाचार की हिम्मत कर सकता है। जाहिर है सिर्फ दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कलमाडी एंड कंपनी के बॉयकॉट कर देने भर से उनका दामन पाक साफ नहीं हो जाता। उन्हें देश की जनता को ये भरोसा दिलाना होगा कि इस महालूट में उनका कोई योगदान नहीं था , क्योंकि तब तक ये शंका हर भारतीय के दिलोदिमाग में जिंदा रहेगी....और वो ये सवाल पूछता रहेगा कि कलमाडी ने जो किया सो किया पर कलमाडी के पीछे कौन ?

Tuesday, 7 September 2010

सूरज पर इंसान ?

सूरज का हमला....सुनकर ही दिल खौफ से भर जाता है....कुछ दिनों पहले अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों ने दुनिय़ा को धरती पर आने वाले इस खतरे की जानकारी देकर चौंका दिया....सवाल उठे , कैसे रोंकेगे वैज्ञानिक इसे.....क्या वाकई 10 करोड़ हाइड्रोजन बमों के बराबर का तूफान हमारी इस खूबसूरत दुनिया को खत्म कर देगा.....या फिर इसे रोका भी जा सकता है....आखिर कैसे किया जाएगा सूरज पर कब्जा....चांद पर पहुंच चुका है इंसान....मंगल पर हो रही है जिंदगी तलाशने की कोशिश ....लेकिन कैसे पहुंचा जाए इस धधकते हुए सूरज तक.....जिसकी गर्मी लाखों किलोमीटर दूर तक सबकुछ जला कर खाक करने का माद्दा रखती है...जिससे आने वाला तूफान धरती के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है....कैसे करे कोई हिमाकत आग के इस कुदरती गोले के नजदीक पहुंच कर मंडराने की.......उसे जांचने की...उसे परखने की......लेकिन इस बार वैज्ञानिकों ने हिम्मत कर ली है.....नासा के वैज्ञानिक अब सूरज की आंखों में आंखे डालकर देखने जा रहे हैं....और इस महत्वाकांक्षी मिशन को नाम दिया गया है सोलर प्रोब प्लस

जी हां सोलर प्रोब प्लस....नासा का ये वो मिशन है जिसके बारे में दुनिया भर के वैज्ञानिक अभी सिर्फ और सिर्फ कल्पना ही कर पाए हैं.....लेकिन अब होने जा रहा है ये ख्वाब साकार......नासा के वैज्ञानिकों ने शुरू कर दी है इस मिशन के जरिए कोशिश आग उगलते सूरज के बेहद नजदीक पहुंचने की। तैयारी पूरी हो चुकी है.....हमारे सौरमंडल और सूरज से जुड़े हजारों रहस्यों को सुलझाने के लिए अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा पहली बार सूर्य के वायुमंडल के अंदर सीधे एक अंतरिक्ष यान भेजने जा रहा है......जरा सोचिए आग से लपलपाते सूरज के वायुमंडल में इंसानी ताकत का मुजाहिरा करता एक अंतरिक्ष यान.....लेकिन क्या ये इतना आसान होगा...जवाब है नहीं.....ये बहुत मुश्किल है.....क्योंकि इस अंतरिक्ष यान को आग उगलते सूरज के बेहद करीब उससे सिर्फ चार लाख मील की दूरी तक पहुंचना है.....जी हां सिर्फ इस लिए लगा रहा हूं क्योंकि आपको हमको ये दूरी शायद बहुत लगे.....लेकिन आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि सूरज से चार लाख मील दूर भी उसकी गर्मी किस कहर बनकर टूटती है....बड़े से बड़ा अंतरिक्ष यान भी यहां एक सेंकेड भी टिक नहीं सकता....क्योंकि ये गर्मी पल भर में सब कुछ खाक कर देती है....तो फिर क्या होगा नासा के मिशन सोलर प्रोब प्लस का...

जी हां इस मिशन की तैयारी में जुटे वैज्ञानिकों के लिए भी ये सबसे बड़ा सवाल था और इसीलिए नासा के इस अंतरिक्ष यान को सूर्य के वायुमंडल में पहुंचकर भी अपना वजूद बरकरार रखने के लिए खास तरह से तैयार किया गया है। अंतरिक्ष यान की ऊपरी परत को खासतौर पर एंटी टेंपेरेचर टेक्नॉलजी से बने कार्बन से बनाया गया है जो सूरज के गर्म शोलों से उसकी हिफाजत करेगा....और 1400 डिग्री के भयानक तापमान और जबरदस्त भीषण रेडियोधर्मिता को झेलेगा....नासा का ये मिशन साल 2018 तक सूरज पर भेजे जाने की उम्मीद है....पूरे ब्रह्मामांड में ये पहला मौका होगा जब कोई अंतरिक्ष यान सूरज के इतने नजदीक पहुंचेगा....इतने नजदीक कि यान में लगे टेलिस्कोप सूरज की 3 डी तस्वीरें उतार पाने में सक्षम होंगे.....जब सूरज के शोलों की जबरदस्त गर्मी यान के एंटीना से टकराएगी तो उसका हाइवोल्टेज यान में रिकॉर्ड हो जाएगा....और वैज्ञानिक सूरज के हमले के खतरे की ताकत का अंदाजा लगाकर उसका तोड़ ढूंढने में जुट जाएंगे। है न कमाल की बात ।

Sunday, 1 August 2010

राहुल 'पब्लिसिटी' महाजन

उन दिनों बीजेपी मेरी बीट हुआ करती थी, एक प्रोडक्शन हाउस के लिए मैं रिपोर्टिंग करता था। इन्ही दिनों बीजेपी के चाणक्य प्रमोद महाजन को भी कई बार नजदीक से देखने का मौका मिला कई बार पार्टी कार्यालय में या फिर सफदरजंग लेन के उनके बंगले पर। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में प्रमोद महाजन की क्या हैसियत थी किसी से छुपी नहीं...पार्टी के हर फैसलों में उनका दखल होता और सरकार के हर काम उनसे सलाह लिए बिना किए नहीं जाते। बेहद सधा हुआ व्यक्तित्व , दिग्गज राजनेताओं जैसे हावभाव और बोलने में महारत । जमीन से जुड़ा नेता न होने के बावजूद प्रमोद महाजन का पार्टी में कोई सानी नहीं था। हालांकि उस वक्त भी उनकी पर्सनल जिंदगी को लेकर पत्रकार बिरादरी में तरह तरह की चर्चाएं होती रहतीं थीं पर प्रमोद महाजन ऐसी बातों को सौ पर्दों में रखना अच्छी तरह जानते थे। राज़ तो बहुत थे पर उनकी जिंदगी तक वो राज़ ही रहे। ये भी एक संयोग है कि अपने ही भाई के हाथों हत्या के बाद उनकी मौत भी एक ऐसा राज़ बन गई जो कभी दुनिया के सामने नहीं खुल पाएगा।

प्रमोद महाजन की अचानक हत्या और महाजन फैमिली पर टूटा दुखों का पहाड़.....ये वो पल था जब देश ने पहली बार महाजन परिवार के चश्मो चिराग की सूरत देखी, उसे पहचाना। ये वो पल था जब मां रेखा महाजन और बहन पूनम महाजन को राहुल की सबसे ज्यादा जरूरत थी.....पिता की जलती चिता के सामने मां को संभालते, उन्हें दिलासा देते राहुल महाजन को जिसनें भी देखा वो....रो दिया....लोगों को पहली बार पता चला कि प्रमोद महाजन का इतना बड़ा बेटा भी है। साथ ही लगा कि चलो अब पूरे घर की जिम्मेदारी राहुल के कंधों पर होगी। बीजेपी के कुछ नेता तो राहुल महाजन में प्रमोद महाजन का अक्स भी देखने लगे और उन्हें राहुल मे प्रमोद जी का राजनीतिक वारिस नजर आने लगा । पर पिता की अस्थियों को गंगा मय्या की गोद भी नसीब नहीं हुई थी कि राहुल ने अपना असली रूप दुनिया के सामने दिखा दिया। वो ड्रग्स के चंगुल में ऐसा फंसे कि जेल तक जाना पड़ा.....जमानत पर रिहा हुए....तो उन्हें खुद सहारे की जरूरत थी.....मेरे ख्याल से कोई भी भूला नहीं होगा उन तस्वीरों को जिसमें चार पांच पुलिस वाले उन्हें पकड़कर , कंधों से उठाकर कोर्ट से बाहर ला रहे थे।

जिसे प्रमोद जी के जाने के बाद खुद परिवार का सहारा बनना था वो खुद बेसहारा था। और ऐसे मुश्किल वक्त में उनका सहारा बनीं श्वेता सिंह। राहुल का पहला प्यार और उनके बचपन की दोस्त श्वेता। राहुल और श्वेता दोनों ने जेट एयरवेज में पायलट के तौर पर अपना करियर शुरू किया था। दरअसल प्रमोद महाजन की भी ये दिली इच्छा थी कि श्वेता उनके घर की बहू बने । सो राहुल की आदतों के बारे में सब कुछ जानते हुए भी श्वेता ने अपने दिल की आवाज सुनी....और राहुल से शादी कर ली। खुद श्वेता ने एक बार कहा था कि उस वक्त हालात ही कुछ ऐसे हो गए थे जिन्हें मैं इग्नोर नहीं कर पाई वही किया जो दिल ने कहा....

पर अफसोस मुश्किल वक्त में खुद का सहारा बनने वाले अपने इस हमसफर को भी राहुल ने वो दर्द दिए कि रिश्तों का सारी डोर टूट गई...शादी के एक साल 4 महीने ही बीते थे कि एक अखबार में छपी चंद तस्वीरों ने एक बाऱ फिर महाजन परिवार के इस लाडले की पर्सनल जिंदगी को सड़क पर ला दिया। अपने पति के जुल्म के बाद चोटें दिखातीं श्वेता की तस्वीरों को देखने के बाद कुछ कहने सुनने के लिए बचा नहीं......हवा में श्वेता के साथ प्लेन संभालने वाले राहुल अपनी पहली शादीशुदा जिंदगी के ठहराव को संभाल नहीं सके... खबर ये भी आई कि बॉलीवुड की एक अभिनेत्री के साथ राहुल महाजन का रिश्ता इस शादी पर भारी पड़ा। हर तरफ चर्चे होने लगे राहुल की रंगीन मिज़ाजी के , मीडिया की नजर में प्रमोद महाजन का वारिस अब राहुल महाजन से रंगीला राहुल बन चुका था। श्वेता ने तलाक की अर्जी दाखिल की । राहुल भी तलाक लेना चाहते थे..इसलिए कोई परेशानी नहीं आई और दोनों का तलाक हो गया....और इस तरह से राहुल की रंगीली दुनिया और उनके बुरे बर्ताव ने उनका पहला प्यार उनसे छीन लिया....और पुरानी दोस्त श्वेता के साथ उनकी पहली शादी नाकाम हो गई....

इस बीच एक काम और हुआ था इतने दिनों तक गलत कारणों से ही सही मीडिया में छाए रहने के बाद राहुल महाजन एक जाना पहचाना चेहरा बन चुके थे , लोग उन्हें जानने लगे थे सो उन्हें मौका मिला बिग बॉस 2 में एक कंटेस्टेंट के तौर पर, लेकिन यहां भी राहुल ने प्रमोद महाजन की जिंदगी भर की कमाई इज्जत में पलीता लगाने में कोई कसर छोड़ी नहीं। कभी मोनिका से इश्क लड़ाया तो कभी पायल रोहतगी का मसाज करते नजर आए। कभी पूल में तो कभी आधी रात को लड़कियों के कमरे के अंदर। हर किसी को बता दिया कि राहुल किस चिड़िया का नाम है, एक दो कॉमेडी शोज जज करने के बाद टीवी पर चले महीने भर के ड्रामे, माफ कीजिएगा रिऐलिटी शो के बाद कोलकाता की मॉडल डिंपी से शादी भी टीवी पर ही रचा ली । उऩ दिनो राहुल से एक बार मेरी बात हुई तो वो इसी बात पर जोर देते रहे कि इस बार शादी सात जन्मों के लिए कर रहा हूं, सीरियस हूं , अब आप टीवी वालों को कुछ कहने का कोई मौका नहीं दूंगा। पर देखिए पांच महीने भी नहीं गुजरे की एक बार फिर घर की लड़ाई सड़कों पर, एक बार फिर पत्नी डिंपी, श्वेता की तर्ज पर अखबार वालों को उनकी दीं चोटें गिनाती फिर रही हैं और पायल जैसी हसीनाओं से अफेयर के चर्चे मीडिया की सुर्खियां बनी हुई हैं।

वाकई आज हैरत होती है देखकर कि राहुल उसी प्रमोद महाजन के बेटे हैं जिन्होंने हर पल मीडिया के बीच रहकर भी कभी अपनी व्यक्तिगत बातों को पब्लिक नहीं होने दिया । राहुल के ये रंग देखकर मुमकिन है बहुत लोग उनकी परवरिश पर भी सवाल खड़े करते हों । पर राहुल को इन सब बातों से शायद कोई फर्क नहीं पड़ता, अपने पिता की कमाई जिंदगी भऱ की इजज्त , वो शोहरत शायद उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। पिता की कमाई दौलत को खर्च करने के अलावा उनके पास बस एक ही काम है पब्लिसिटी हासिल करना। और राहुल इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं , ये सोचकर कि बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा। प्रमोद महाजन आज जिंदा होते तो रो रहे होते अपने इस सपूत की कारस्तानियों पर.......कम से कम मुझे तो यही लगता है।

Monday, 26 July 2010

बीजेपी का 'शाह' तिलक

तीन दिनों से फरार अमित शाह जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में अचानक प्रकट हुए तो लगा कि नेता जी पूरी तैयारी के साथ आए होंगे मीडिया के सवालों का जवाब देने। पर अफसोस थोथा चना बाजे घना वाली कहावत याद आ गई शाह के मुंह से निकली अमृत वाणी सुनकर। एक रिपोर्टर ने उनके और एनकाउंटर करने वाले पुलिस वालों के बीच की बातचीत के ब्यौरे पर सवाल दागा कि क्या कहेंगे शाह साहब आप अपनी सफाई में । सवाल पूछने पर मोदी का ये खासमखास नेता बोल पड़ा कि आपकी मुझसे बात हो रही है , अब अगर मै हत्या कर दूं तो आप दोषी हो जाएंगी। शाह ने समझा मैने सही निशाने पर तीर मारा है, अंदर ही अंदर खुशी उबाल मार रही थी कि एक पत्रकार ने सवाल दाग कर उनकी खुशी वापस हलक में अटका दी, सवाल बहुत छोटा था लेकिन तीर की तरह निशाने पर लगा। पत्रकार ने पूछा, मतलब हत्या आपने नहीं उन पुलिस अफसरों ने की । शाह को मानों काटो तो खून नहीं, क्या बोलें क्या न बोलें। चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था मानों किसी ने चोरी पकड़ ली हो। कुछ समझ नहीं आया , बात तो पते की थी कुछ बोला न गया सो कुछ देर सोचने के बाद बेशर्मी भरी मुस्कान चेहरे पर तैर गई। मन में उमड़ रहे झुंझलाहट के तूफान को संभालते हुए नेता जी उस पत्रकार से बोले आप सीबीआई में शामिल हो जाइए । बात खत्म हो गई औऱ शाह की जान में जान आई। जाहिर है कांग्रेस को गरियाने औऱ तोहमत लगाने के अलावा अमित शाह के पास मीडिया को बताने के लिए कुछ भी ऐसा नही था जो उन्हें बेकसूर साबित कर सके।

शाह ने जो किया सो किया, मार्बल लॉबी को परेशान करने वाले एक गैंगस्टर सोहराबुद्दीन का फर्जी एनकाउंटर फिर उसकी बेकसूर बीवी की जहर का इंजेक्शन देकर हत्या और फिर सोहराबुद्दीन के राइट हैंड तुलसी प्रजापति का फर्जी एनकाउंटर । इन तमाम आरोपों की सफाई अब उन्हें अदालत में देनी होगी। पर सवाल ये नहीं है कि जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा चुका हत्या का एक आरोपी मंत्री बचेगा या नपेगा ? सवाल तो ये है कि देश के मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को क्या हो गया है आखिर हत्या अपहरण और जबरन वसूली जैसे संगीन आरोपों से सने एक शख्स की भरी मीडिया के सामने आरती उतारकर उसकी जयजय कार करके वो साबित क्या करना चाहती है। आखिर ये स्वागत और नारेबाजी किसलिए, क्या अमित शाह कोई जंग जिताउ योद्धा बनकर पार्टी दफ्तर आए थे। या फिर उन्होंने कुछ ऐसा काम किया था जिससे गुजरात की अस्मिता में चार चांद लग गए ।

कहीं ऐसा तो नही कि नरेन्द्र मोदी को सिर आंखों पर बैठाने वाली बीजेपी को सोहराबुद्दीन के खून से रंगे हाथों में नया हिंदू ह्रदय सम्राट नजर आ रहा है । शायद ऐसा ही है तभी तो गुजरात में पार्टी के आला नेतृत्व से लेकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने आडवाणी के घर मीटिंग के बाद उस वक्त फरार चल रहे अमित शाह के सिर पर हाथ रख दिया। किसी ने एक बार ये नहीं कहा कि कानूनी प्रक्रिया का पूरा सम्मान करते हुए शाह जांच में मदद करेंगे। उल्टे ये दावा किया गया कि केंद्र की कांग्रेस सरकार सीबीआई जांच के बहाने शाह पर निशाना साधकर गुजरात में बीजेपी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है। लेकिन शायद ये दावा करते हुए बीजेपी ये भूल गई कि सोहराबुद्दीन एनकाउंटर की जांच का जिम्मा केंद्र सरकार ने नहीं बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सौंपा था। क्या बीजेपी का भरोसा देश की न्यायिक व्यवस्था से भी उठ गया है ? अचानक उसके लिए अमित शाह इतने खास कैसे हो गए कि इतने गंभीर और संगीन आरोपों के तले दबे एक नेता को बचाने के लिए पार्टी ने अपनी इज्जत दांव पर लगा दी। या तो बीजेपी के नेताओं को ये लगता है कि फर्जी एनकाउंटर के एक आरोपी का साथ देकर पार्टी देश के लोगों के बीच बेहतर छवि बना पाने में कामयाब होगी या फिर मोदी का कद पार्टी से भी बड़ा हो चुका है। और अब बीजेपी में वही होगा जो मोदी चाहेंगे। देखिए बीजेपी में मोदी मार्का राजनीति का ये दौर कब तक चलता है और पार्टी को इसका कितना खामियाजा भुगतना पड़ता है

Sunday, 13 June 2010

राजनीति के गड़े मुर्दे

राजनीति में मुर्दे कभी दफन नहीं किए जाते उन्हें जिंदा रखा जाता है ताकि वक्त आने पर वो बोलें....प्रकाश झा की राजनीति में मनोज वाजपेयी का ये डायलॉग आज नरेंद्र मोदी के पटना के ताजा भाषण के बाद अचानक याद आ गया......। पटना में बीजेपी की स्वाभिमान रैली में पूरे कॉन्फिडेंस से कांग्रेस की बखिया उधेड़ते नरेन्द्र मोदी और साल 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी को उनकी ही मांद में घुसकर उन्हें उनकी औकात बतातीं सोनिया गांधी.....राजनीति के गड़े मुर्दे होते क्या हैं ये जानने के लिए इन दोनों बातों का जिक्र एक साथ करना लाज़मी है....क्योंकि आज अरसे बाद मोदी ने एक बार फिर कुछ गड़े मुर्दों को बुलवाया है....सोनिया गांधी को खरी खरी सुनाई है.....मोदी ने कहा कि भोपाल गैस कांड में हजारों लोगों की जानें गईं...और भोपाल के गुनहगार वॉरेन एंडरसन को बचाने में उस वक्त की कांग्रेस शासित केंद्र और राज्य सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी ....अब सोनिया गांधी इस मसले पर चुप क्यों हैं....वो अपना मौन तोड़ें और देश को बताएं कि असली 'मौत का सौदागर' कौन है.....

मोदी एक सधे हुए राजनेता हैं...वो एक एक शब्द तोलकर बोलते हैं....'मौत का सौदागर' - गुजरात दंगों की कालिख ढो रहे मोदी के लिए ये जुमला बेहद खास है....क्योंकि पहली बार इसका इस्तेमाल 2007 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनके खिलाफ अपनी एक चुनाव रैली में किया था ....सोनिया ने मोदी की इस दुखती रग पर ये सोचकर हाथ रखा था कि मोदी को मौत का सौदागर बताने पर अल्पसंख्यकों के जख्म हरे होंगे....एक सूबे की जनता को अपने मुखिया के चेहरे के पीछे छुपा चेहरा नजर आएगा...और वोट लहर उनके पक्ष में जाएगी.....लेकिन हुआ ठीक इसका उलट.....वोटरों के ध्रुवीकरण में माहिर मोदी की राजनीति जीती और कांग्रेस को मिली हार....और एक बार फिर गुजरात दंगों के आरोपी मोदी भारी बहुमत से जीतकर गुजरात की सत्ता पर काबिज होने में सफल हुए....वो दिन और आज का दिन...मौत के सौदागर नाम का ये जुमला...मोदी का चहेता जुमला बन गया...क्योंकि ये उन्हें याद दिलाता है उनकी जीत और सोनिया की हार की। वैसे दाद देनी होगी मोदी के कॉन्फिडेंस की इस जुमले का दुबारा जिक्र करने से वो जरा भी नहीं चूके....ये जानते हुए कि इस जुमले की आंच में देश के लिए सबसे बड़ा शर्म बन चुके गुजरात दंगों के जख्म फिर से हरे हो सकते हैं...मोदी ने दरअसल इस बात की कभी फिक्र की ही नहीं ...क्योंकि राजनैतिक तौर पर दंगों के दंश ने उन्हें फायदा ही फायदा दिया है....दंगे हमेशा उनके लिए मुनाफे का सौदा ही साबित हुए हैं। वो पहले से ज्यादा मजबूत हुए...बीजेपी में उनका कद बढ़ा....संघ में उनकी पूछ बढ़ी....वो बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार तक कहे जाने लगे...और दंगों का दाग लादे सरकार कायम रखकर खुद को उन्होंनें एक मझा हुआ राजनेता साबित किया।

वैसे मोदी के इस बयान को सुनकर चोर चोर मौसेरे भाई वाली कहावत भी याद आ गई.....क्योंकि मोदी कांग्रेस से यही तो कहना चाहते थे कि 2002 में गुजरात में मैने जो किया वो किया, हमारा दामन अगर दागदार है तो आप कौन से दूध के धुले हैं...आखिर भोपाल गैस कांड में 25000 मौतों के जिम्मेदार शख्स यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन को कांग्रेस की तत्कालीन राज्य और केंद्र सरकार ने भगाने में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखाई । मोदी ने इस बार सोनिया की ही तरह कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रखा है, ये मु्द्दा वैसे भी इस वक्त कांग्रेस के गले की सबसे बड़ी हड्डी है...सोनिया गांधी चुप हैं और प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गजों तक को ये समझ में नहीं आ रहा कि पार्टी की खाल कैसे बचाई जाए.....जाहिर है ये दौर 1984 का तो है नहीं कि सरकारें कुछ भी करके निकल जाएं...हमारे देश का मीडिया आज बेहद मजबूत है और सरकारी निकम्मेपन की पोल खोलने को आतुर भी....जनता भी अब पहले से ज्यादा जागरूक है और सरकारें जवाबदेह....लिहाजा कांग्रेस को बैकफुट पर जाने के अलावा कोई चारा नजर नहीं आता।

अब राजनीति में गड़े मुर्दे कितना काम आते हैं ये तो आप समझ गए होंगे..लेकिन मुमकिन है मेरी तरह ये न समझ पाएं हों कि आखिर मोदी के गड़े मुर्दे जब जिंदा होते हैं उन्हें फायदा क्यों पहुंचा जाते हैं और कांग्रेस के गड़े मुर्दे जब कब्र से बाहर आते हैं तो पार्टी को नुकसान क्यों दे जाते हैं....समझ में आ जाए तो बताइएगा जरूर.....

Sunday, 6 June 2010

प्रकाश झा की मजबूर'नीति'

राजनीति किस हद तक गंदी हो सकती है, राजनीति कैसे रंग बदल सकती है...और राजनीति कैसे एक भरे पूरे परिवार को नफरत और बदले की आग में अंगार बना सकती है....ये सब कुछ देखने को मिला प्रकाश झा की राजनीति में। हमारे देश की स्टेट पॉलिटिक्स का खाका खींचने की कोशिश में झा बहुत हद तक कामयाब रहे हैं....गंगाजल और अपहरण जैसी फिल्मों के जरिए जबरदस्त फैन फालोइंग बटोरने वाले प्रकाश झा ने इस फिल्म के बाद अपना लोहा मनवाने वालों की फेहरिस्त में और इजाफा कर दिया है। इस वीकएंड फिल्म देखकर निकला तो मन में यही ख्याल आया कि महाभारत के किरदारों की माला में आज के राजनेताओं को पिरोने का ये काम बखूबी अंजाम दिया है डायरेक्टर ने...बड़ा कैनवास, बड़ा बजट और सितारों की लंबी चौड़ी फौज....और नाना से लेकर रणबीर तक सबकी शानदार अदाकारी....मानो एक एक एक्टर इसी रोल के लिए बना हो....सिवाय एक के...

समझ नहीं पाया कि आखिर क्या मजबूरी रही होगी प्रकाश झा जैसे दिग्गज डायरेक्टर के सामने कि वो फिल्म में एक भी लाईन हिंदी में ढंग से न बोल पाने वाली कटरीना कैफ को लेने पर मजबर हुए.....वो कटरीना जो इस मजबूत फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुईं....जिन्होंनें अपनी अल्हड़ अदाकारी से ये जता दिया कि इतनी फिल्में करने और बॉलीवुड की नंबर वन हिरोइन का तमगा हासिल करने के बाद भी उन्हें अदाकारी की कितनी समझ है...कटरीना ने इस फिल्म के जरिए उन्हें फिल्में हिट कराने का सबसे कामयाब फार्मूला मानने वाले फिल्मकारों को ये भी बता दिया है कि सीरियस रोल्स में उन्हें लेने की भूल न ही करें तो अच्छा...दो चार गाने , दो चार डांस और फिल्मों में ग्लैमर का तड़का लगाने के लिए ही उनका इस्तेमाल किया जाए तो अच्छा ..... जैसा वो अबतक करती आईं हैं....क्योंकि राजनीति में कटरीना जब जब नजर आईं उन्होंनें अपने नाकाबिलियत से दर्शकों को इस बात का ही अहसास कराया कि आप ये सोंचने की भूल न करें कि ये रिएलिटी है...हम लोग ड्रामा कर रहे हैं...तीन घंटे का ड्रामा देखिए और खुशी खुशी घर जाइए....

हिंदी में कटरीना के डायलॉग्स की डबिंग खुद उनसे कराने में प्रकाश झा इतना फख्र क्यों महसूस कर रहे थे , फिल्म देखने के बाद कम से कम मैं तो समझ नहीं पाया...क्योंकि मेरे हिसाब से ये उनके कद के डायरेक्टर की सबसे बड़ी भूल थी , अफसोस प्रकाश झा के चुनाव पर नहीं वक्त पर भी होता है..प्रकाश झा भी क्या करें...बॉलीवुड का ये वो दौर है जिसमें उम्दा अभिनेत्रियों का अकाल पड़ा हुआ है, विदेशों से अभिनेत्रियां इम्पोर्ट की जा रही हैं और यहां लाकर उन्हें स्टार बनाया जा रहा है...तभी तो राकेश रोशन जैसे दिग्गज मैक्सिकन ब्यूटी बारबरा मोरी और इम्तियाज अली गिजे़ल मोंटारियो की अदाकारी पर यहां की अदाकाराओं से ज्यादा भरोसा करते हैं..मिस श्रीलंका जैक्कलीन फर्नाडिंस एक साथ कई फिल्मों में नजर आती हैं..... आप इसे बॉलीवुड का ग्लोबलाइजेशन भी कह सकते हैं पर एक नजर अपने बॉलीवुड पर डालेंगे तो तस्वीर बहुत हद तक साफ हो जाएगी....जरा एक नजर दौड़ाइये और सोचिए आज के दौर में कौन है ऐसी अभिनेत्री जिसमें माधुरी दीक्षित की संजीदगी भी नजर आए और श्रीदेवी का चुलबुलापन भी । जो हर तरह के किरदार में ढलने का माद्दा रखती हो, जो वाकई में अपने दम पर फिल्में चलवाने का दमखम रखती हो....कटरीना से लेकर करीना तक.....और दीपिका से लेकर सोनम कपूर नए दौर की नायिकाओं में सबका ध्यान अभिनय की बारीकियां सीखने में कम, अपने बोल्ड लुक से दर्शकों को चौंकाने और साइज जीरो पर ज्यादा है......देखिए कब खत्म होता है नाकाबिल अभिनेत्रियों की मौज का ये दौर.... कब मिलती है हिंदी सिनेमा को दूसरी माधुरी ...और कब तक चलती है प्रकाश झा जैसे फिल्मकारों की मजबूर नीति।

Thursday, 13 May 2010

'कुत्ता' भी शर्मिंदा है !

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी आजकल कुत्तों से बचते फिर रहे होंगे वो क्या है कि सारी कुकुर बिरादरी उनसे नाराज चल रही है । गडकरी ने मुलायम और लालू यादव सरीखे नेताओं से उनकी तुलना जो कर दी । मुमकिन है वो सोच रहे हों कि इतने सालों की वफादारी का गडकरी नाम के इस इंसान ने आखिर ये क्या सिला दिया। संघ की पाठशाला के अगली पंक्ति के चेले रहे नए नवेले बीजेपी अध्यक्ष कह बैठे कि लालू मुलायम तो सोनिया गांधी के तलवे चाटने वाले कुत्ते हैं, मुहावरा प्रेमी गडकरी ने अब ऐसा अनजाने में कहा या जान बूझकर कह नहीं सकता , क्योंकि 'कुत्ता नहीं कुत्ते जैसा कहा' ये कहकर खेद व्यक्त कर लेने के बाद भी मेरी जब उनसे बात हुई तो अपने कहे का पछतावा तो दूर की बात वो एक बार भी ये मानने के लिए तैयार नहीं हुए कि उनसे कोई गलती हुई है। बोले मुझे जो कहना था कह दिया आप मीडिया वाले मतलब निकालते रहिए। मतलब मैने तो यही निकाला कि गडकरी मानते हैं कि बुराई कुत्ता जैसा होने में नहीं, कुत्ता होने में है ।

बहरहाल गडकरी के बयान के बाद मैने खालिस समाजवादी नेता मोहन सिंह से भी बात की। बातचीत का लबोलुआब मैने यही निकाला कि देखो इस पुराने समाजवादी बुजुर्ग नेता को वाकई में बहुत बुरा लगा होगा अपने नेता के खिलाफ गडकरी की ऐसी भाषा सुनकर...पर सुबह उठा तो लगा कि मेरी सोच गलत थी...मोहन सिंह भी 'कुत्ता' प्रेमी निकले...टीवी खोला तो शिबू सोरेन पर निशाना साधते हुए वो भी बेचारे इस बेजुबान जानवर को नीचा दिखाने में लगे थे, कह रहे थे कि वो कुत्ता कौन है जो सोनिया और कांग्रेस के तलवे चाट रहा है...शब्दों के इस्तेमाल का तरीका किसी गडकरी जैसे नौसिखिए का भले ही न हो पर तेवर वैसे ही थे...वफादारी की मिसाल कहे जाने वाले कुत्ते भी ,नेताओं की इस कड़वी जुबान पर रो ही रहे होंगे. क्योंकि इन नेताओं ने इन्हें अचानक नफरत और हिकारत का सिंबल जो बना दिया है। रही बात लालू यादव के दल आरजेडी की तो एक दिन पहले तक चैनलों पर गडकरी के खिलाफ आंदोलन की धमकी दे देकर उन्हें कोसने वाले राम कृपाल यादव गडकरी से भी एक कदम आगे निकल गए और गुस्से में तमतमाकर उन्हें छछूंदर कह बैठे। जाहिर है नेताओं के इस घमासान को देखने के बाद दलाली, घूसखोरी और गंदी राजनीति से कोसों दूर रहने वाले ये बेजुबान जानवर पसोपेश में पड़े हुए होंगे....कि आखिर हमारा नाम ये नेता बदनाम करने में क्यों लगे हुए हैं , हमने भला किसी का क्या बिगाड़ा ?

जो भी हो हमारे नेताओं की इस छिछली वाणी ने ये तो साबित कर ही दिया कि आज के इस दौर में जहां ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे पदों के लिए वहां के नेता टीवी पर सबके सामने किसी भी मुद्दे पर खुली बहस का माद्दा रखते हैं वहीं गांधी , नेहरू और मोरारजी जैसे दिग्गजों की इस धरती पर आजकल के नेताओं को विरोधी दल पर हमला बोलने के लिए इन बेजुबान जानवरों के नाम का सहारा लेना पड़ता है। उन लफ्जों का इस्तेमाल करना पड़ता है जो कहीं से भी शालीनता के दायरे में नहीं आते। जाहिर है देश की राजनीति में छिछली सोच वाले ये वो नेता हैं जिनकी लेखनी तो पहले से ही कमजोर थी अब जुबान भी बेलगाम हो गई है। बेशक ऐसे नेताओं की तादाद हर पार्टी में बेतहाशा बढ़ रही है, उम्मीद की जानी चाहिए कि वक्त के साथ साथ हमारे नेता भी बदलेंगे ।

Monday, 29 March 2010

बिग बी पर बिग ड्रामा

ये क्या हो गया है कांग्रेस पार्टी को, क्यों पार्टी के सारे के सारे नेताओं को अचानक अमिताभ बच्चन तो क्या पूरे के पूरे बच्चन परिवार से अलर्जी हो गई है। हद तो तब हो गई जब कांग्रेस ने सीधे सीधे बिग बी से सवाल करते हुए ये कहा कि वो देश के लोगों को बताएं कि गुजरात दंगों और उसमें नरेंद्र मोदी की भूमिका पर उनकी राय क्या है। गोया अमिताभ न हुए ,बीजेपी के कोई नेता हो गए। अरे भई मैं पूछता हूं आप होते कौन हैं उनसे ये सवाल पूछने वाले । आखिर किस हैसियत से देश की एक पॉलिटिकल पार्टी एक नॉन पॉलिटिकल इंसान से ये सवाल पूछ रही है ? पार्टी के नेता मनीष तिवारी तीखे तेवर दिखाते हुए कहते हैं कि अगर अमिताभ बच्चन गुजरात के ब्रांड अंबैसडर हैं तो उन्हें दंगों और मोदी पर अपनी सोच जाहिर करनी होगी....पहले तो वो ये जान लें कि अमिताभ गुजरात के नहीं गुजरात टूरिज्म के ब्रैंड अंबैसडर हैं....और देश को ये बताएं कि करोड़ों लोगों के चहीते इस सितारे से पार्टी आखिर किस हैसियत से ये सवाल पूछ रही है। और अमिताभ कांग्रेस के किसी सवाल का जवाब भला क्यों दें। अगर अमिताभ बच्चन की जगह कोई और इंसान गुजरात टूरिज्म का ब्रैंड अंबैसडर होता तो भी क्या कांग्रेस पार्टी उससे ये सवाल करती ।

पिछले कुछ दिनों से लगातार अमिताभ को लेकर जिस तरह की राजनीति कांग्रेस ने की है उसने मुझे शिवसेना और एमएनएस सरीखी पार्टियों की याद दिला दी। बिना किसी बात के इस तरह के तीखे बोल बोलने का जिम्मा तो तो अभी तक देश की इन्ही पार्टियों ने अपने हाथ में ले रखा था लेकिन अब कांग्रेस वाले भी न जाने क्यों इनके नक्शे कदम पर चलने को बेताब हैं। तभी तो सी लिंक के उद्घघाटन समारोह में अमिताभ के साथ मंच पर बैठ कर ठहाके लगाने वाले कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण चंद घंटों के बाद ही उनकी बेइज्जती कर ये कहते नजर आते हैं कि अगर उन्हें पता होता कि अमिताभ यहां आने वाले हैं तो वो वहां जाते ही नहीं । मानो अमिताभ न हो गए कोई कटाऊ हो गए। सालों का रिवाज तोड़ते हुए पुणे के मशहूर मराठा साहित्य सम्मेलन के समापन समारोह से वो एक दिन पहले ही पहुंच जाते हैं इस डर से कि इस समारोह में भी मुख्य अतिथि अमिताभ बच्चन ही थे, तो कहीं फिर से उनका सामना न पड़ जाए । दलील वही कि अमिताभ से परहेज इसलिए नहीं कि वो अमिताभ बच्चन हैं , परहेज इसलिए क्योंकि वो गुजरात से जुड़े हैं , नरेंद्र मोदी से जुड़े हैं । कम ही लोग जानते होंगे कि ये वही अशोक चव्हाण हैं जिनके चुनाव प्रचार के लिए बिग बी खुद एक जमाने में नांदेड़ जा चुके हैं

2002 के गुजरात दंगे देश के माथे पर कलंक हैं , इस देश के लिए सबसे बड़ा शर्म हैं और इन दंगों में उस वक्त के और मौजूदा सीएम नरेंद्र मोदी की कितनी और कैसी भूमिका थी ये देश को बताने की जरूरत भी नहीं । लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम तालिबान बनकर किसी को उस राज्य का पर्यटन प्रमोट करने से ही रोक दें । उस राज्य के साथ जुड़ने वाले हर एक शख्स पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगा दें। देश के मुसलमानों को खुश करने में लगी कांग्रेस शायद ये भूल रही है कि ऐसा करके वो, दरअसल हर एक मुद्दे को 5 करोड़ गुजरातियों की अस्मिता से जोड़ने वाले नरेंद्र मोदी के हाथ में एक हथियार सौंप रही है , एक ऐसा हथियार जिसकी धार, धर्म की राजनीति में माहिर ये नेता अमिताभ के बहाने अपनी वेबसाइट पर कांग्रेसियों को गुजरात विरोधी और विकृत मानसिकता वाला साबित करके दिखा भी चुका है ।

Tuesday, 23 March 2010

महिला आरक्षण और मुलायम की सीटी

लगता है किसी जमाने में खूबसूरत लड़कियों को देखकर सीटियां मारना मुलायम का शौक रहा है तभी नेताजी को लगता है कि महिला आरक्षण के बाद संसद में ऐसी महिलाएं आएंगी जिन्हें देखकर लोग (जाहिर है बात संसद की हो रही है तो सांसद) सीटी बजाएंगे। एक प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय सरकार में देश की रक्षा की जिम्मेदारी संभाल चुके मुलायम सिंह यादव सरीखे नेता के इस आपत्तिजनक बयान को सुनकर सबसे पहले एक ही सवाल जेहन में आया । क्या थोड़े दिनों पहले तक फिरोजाबाद के गली कूचे में घूम घूमकर लोगों से वोट मांगता पूरा यादव परिवार अपनी बहू डिंपल यादव को इसीलिए संसद तक पहुंचाने का ख्वाब देख रहा था कि बहू संसद तक पहुंच जाए और लोग उसे देखकर सीटियां मारें या फिर फिरोजाबाद की सांसदी, राज बब्बर से 85000 वोटों से हारने के बाद यादव परिवार ने घर में खुशियां मनाईं होंगी कि चलो अब न तो बहू डिंपल संसद तक पहुंचेगी और ना ही कोई उसे सीटियां मारेगा, अच्छा हुआ घर की इज्जत घर में ही रह गई ।

वाकई शर्म आती है इस देश के मुलायम सरीखे नेताओं पर , रोना आता है इनकी राजनीति पर और अफसोस होता है इनकी उस सोच पर जो विकास के पथ पर सरपट दौड़ते देश की टांगे खींचकर उसे पीछे ले जाने पर तुली है । मुलायम के कद के किसी भी नेता ने इस देश में आज तक सार्वजनिक मंच से महिलाओं की इतनी बेइज्जती इससे पहले कभी नहीं की । और इसमें कोई शक नहीं कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ये बयान देते हुए मुलायम के कठोर मन में मुस्लिम और पिछड़ों के वोट बैंक के अलावा और कुछ नहीं घूम रहा था । वैसे अच्छा ही है जो खुद को महिला विरोधी कहने से बिदकने वाले मुलायम ने अपना असली चेहरा दुनिया को दिखा दिया.... द्रौपदी को नारी शक्ति का पर्याय बताने वाले प्रख्यात समाजवादी राम मनोहर लोहिया आज होते तो रो रहे होते अपने इस समाजवादी चेले की सोच पर, खास बात ये है कि मुलायम ने ये शर्मनाक बयान लखनऊ में इन्हीं डा.लोहिया की सौंवी जयंती के मौके पर दिया जिन्हें वो अपना पुरोधा बताते हुए राजनीति करते हैं लेकिन अस्ल में उनके विचारों को कबका दफना चुके हैं ।

मुलायम कहते हैं अगर महिला आरक्षण लागू हो गया तो महिलाएं चुन कर आएंगी उद्योगपतियों और बड़े अफसरों की और संसद में लड़के उन्हें देखकर सीटियां बजाएंगे । कोई समझाए इन्हें कि आखिर 33 फीसदी आरक्षण मिलने के बाद इन्हें अपनी पार्टी में गरीब गुरबा पिछड़ी महिलाओं को टिकट देने से रोका किसने है जो आरक्षण के नाम से बिलबिलाकर , तमाम मर्यादाओं को लांघते हुए वो ऐसा बयान दे रहे हैं वो भी उस दौर में जब मौजूदा 15 वीं लोकसभा में देश के लोगों ने 59 महिला सांसदों को संसद में अपनी नुमाइंदगी का हक दिया है । क्या मुलायम सिंह यादव अपने इस शर्मनाक बयान के बाद इन 59 महिला सांसदों में से अपनी पार्टी की 4 सांसदों की भी आंखों में आंखे डालकर देखने की कुवत रख पाएंगे , क्या वो उनसे पूछने की हिम्मत कर पाएंगे कि अब तक कितनी बार संसद के अंदर उन्हें सांसदों ने सीटियां मारी हैं ।

नेता जी जागिए और समाजवाद की आड़ में सिर्फ मुसलमानों और पिछड़ों की राजनीति करना बंद कीजिए क्योंकि अब देश की जनता इस तरह की ओछी राजनीति से बाज आना चाहती है। हाज़में की गोली खाइए और इस सच्चाई को हज़म कीजिए कि आपके और आप जैसे चंद नेताओं की नौटंकी के बाद भी राज्यसभा में महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आऱक्षण मिलने का रास्ता साफ हो चुका है और वो दिन दूर नहीं जब देश की जनता 180 महिलाओं को अपना सरपरस्त चुनकर लोकसभा तक पहुंचाने वाली है । वाकई इंतेजार रहेगा उस दिन का क्योंकि वो दिन महिलाओं को हमेशा दबा कर रखने वाली इस पुरूषवादी सोच पर सबसे बड़ा तमाचा होगा..आमीन

Sunday, 21 March 2010

हम नहीं सुधरेंगे !

संडे को फनडे कहा जाता है आमतौर पर इस दिन लोगों की छुट्टियां होती हैं...पर मैं उन खुशनसीबों में से नहीं..बहरहाल इस रोने धोने का तो कभी अंत होगा नहीं...सो आगे बढ़ते हैं । मन मार कर घर से निकला और ऑफिस पहुंचते ही एक खौफनाक खबर मिली किंगफिशर एअरलाइंस में बम की । खुदा का लाख लाख शुक्र था कि थोड़ी देर में ही ये साफ हो गया कि बम को डिफ्यूज कर दिया गया है और सभी यात्री बाल बाल बच गए पर बार बार जेहन में ये ख्याल आ रहा था कि आज क्या हो सकता था, फिर सोचा कि आतंकवादी चाहे जितनी धमकी दे लें हम नहीं बदलेंगे , आंतकवाद हमारा चाहे जितना कुछ बिगाड़ लें हम नहीं बदलेंगे। ये जानते हुए भी कि मौजूदा दौर के आंतकवाद में सबसे बड़ा खतरा हवाई सुरक्षा को है हम नहीं बदलेंगे । अगर ऐसा न होता तो अखबार में लिपटा एक देसी बम तिरूअनंतपुरम से 753 किलोमीटर की हवाई यात्रा करता हुआ बैंगलोर न पहुंच जाता । प्लेन में बम रखने की साजिश किसकी थी...क्या ये किसी आतंकी संगठन का काम था...या फिर किसी सिरफिरे की करतूत ये तमाम सवाल फिलहाल बेमानी हैं । सबसे बड़ा सवाल फिलहाल यही है कि हम कब सुधरेंगे ?

देश के लिए नासूर बन चुके देसी विदेशी आतंकियों की हवाई हमले की धंमकी और देश भर के सारे एअरपोर्ट को अलर्ट पर रखने के बाद भी न तो कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं प्राइवेट एअरलाइंस के सेक्योरिटी स्टाफ के रवैये में कोई बदलाव आया है और न ही देश भर में एअरपोर्ट की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले सीआईएसएफ के जवान ही चौकन्ना हुए हैं । जरा सोचिए हवा में जमीन से हजारों फीट ऊपर अगर ये बम फट जाता तो क्या होता ... सोच कर भी मेरी रूह कांप उठती है तो इस विमान से तिरूअनंतपुरम से बैंगलोर तक का सफर तय करने वालों पर क्या गुजरी होगी जब उन्हें पता चला होगा कि उनके बैगेज के साथ साथ एक जिंदा बम भी इस सफर में उनका हमसफर था...यकीनन सुरक्षा में इस तरह की चूक करने वालों का जुर्म उन आंतकियों से किसी मायने में कम नहीं है जो जगह जगह धमाके कर मासूमों की जान लेने में अपना फख्र समझते हैं , अगर ये साबित हो जाए कि किसी सेक्योरिटी स्टाफ ने जानबूझकर प्लेन में बम रखने वाले का साथ दिया। ये बात बार बार जेहन में इसलिए आती है क्योंकि बिना किसी स्टाफ के मिले ऐसा कैसे संभव हो सकता है

जब भी हम किसी हवाई यात्रा के लिए एअरपोर्ट पर जाते हैं तो प्लेन में चढ़ने से पहले यात्रियों और उनके सामान की दो बार स्क्रीनिंग की जाती है । एयरपोर्ट में दाखिल होते ही यात्रियों और उनके सामान को मेटल डिटेक्टर और स्कैनर से जांचा जाता है ये काम अममून प्राइवेट एअरलाइंस के सेक्योरिटी स्टाफ का होता है , दूसरे चरण में सीआईएसएफ के जवान यात्री की पूरी तलाशी लेते हैं...यात्री के हैंड बैगेज की एक्सरे जांच होती है...किसने क्या किया और क्यों किया ये जांच का विषय हो सकता है लेकिन इतना तो तय है कि चूक इन दोनों से हुई है और कोई भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता । दरअसल मानिए या न मानिए अब वक्त आ गया है कि विदेशी एअरपोर्ट्स पर अपने वीवीआईपीज़ की सुरक्षा जांच से बिलबिलाकर बयानबाजी करने की बजाय हम अपनी गिरेबान में झांक कर देखें और अपनी खामियों पर पर्दा डालने की बजाए उन्हें जड़ से खत्म करने की सोचे ताकि फिर कभी कोई देश की सुरक्षा से इतना बड़ा खिलवाड़ करने की जुर्रत न कर पाए , ताकि इस देश के अंदर हम खुद को सुरक्षित महसूस कर पाएं और मेरे जैसा पत्रकार कभी ये न कह पाए कि चाहे जो कुछ हो जाए हम नहीं सुधरेंगे ।